Tuesday, 9 August 2016

पुरस्कार किसी को मिले, विवाद होगा ही : प्रदीप त्रिपाठी

"कविता लिखना बोगस काम है!
अरे फालतू है!
एकदम
बेधन्धा का धन्धा!
पार्ट टाइम!
साला कुछ जुगाड़ लगता एमबीए-सैमबीए टाइप
मज्जा आ जाता गुरु!
मने इधर कविता लिखी उधर सेंसेक्स गिरा
कवि ढिमकाना जी ने लिखी पूंजीवाद विरोधी कविता
सेंसेक्स लुढ़का
चैनल पर चर्चा
यह अमेरिकी साम्राज्यवाद के गिरने का नमूना है
क्या अमेरिका कर पाएगा वेनेजुएला से प्रेरित हो रहे कवियों पर काबू?
वित्त मंत्री का बयान
छोटे निवेशक भरोसा रखें!
आरबीआई फटाक रेपो रेट बढ़ा देगी
मीडिया में हलचल
समकालीन कविता पर संग्रह छप रहा है
आपको क्या लगता है, आम आदमी कैसे करेगा सामना इस संग्रह का?
अपने जवाब हमें एसएमएस करे
अबे, सीपीओ (चीफ पोएट्री ऑफिसर) की तो शान पट्टी हो जाएगी!
हर प्रोग्राम में ऐड आएगा
रिलायंस डिजिटल पोएट्री
लाइफ बनाए पोएटिक
टाटा कविता
हर शब्द सिर्फ़ आपके लिए
लोग ड्राईंग रूम में कविता टाँगेंगे
अरे वाह बहुत शानदार है
किसी साहित्य अकादमी वाले की लगती है
नहीं जी, इम्पोर्टेड है
असली तो करोड़ों डॉलर की थी
हमने डुप्लीकेट ले ली
बच्चे निबन्ध लिखेंगे
मैं बड़ी होकर एमपीए करना चाहती हूँ
एलआईसी पोएट्री इंश्योरेंस
आपका सपना हमारा भी है
डीयू पोएट्री ऑनर्स, आसमान पर कटऑफ
पैट (पोएट्री एप्टित्युड टेस्ट) की परीक्षाओं में
फिर लडकियाँ अव्वल
पैट आरक्षण में धांधली के खिलाफ
विद्यार्थियों ने फूँका वीसी का पुतला
देश में आठ ने काव्य संस्थानों पर मुहर
तीन साल की उम्र में तीन हज़ार कविताएँ याद
भारत का नन्हा अजूबा
ईरान के रुख से चिंतित अमेरिका
फ़ारसी कविता की परम्परा से किया परास्त!
ये है ऑल इण्डिया रेडिओ
अब आप सुनें सीमा आनंद से हिंदी में समाचार
नमस्कार!!
आज प्रधानमन्त्री तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय काव्य सम्मेलन के लिए रवाना
इसमें देश के सभी कविता गुटों के कवि शामिल हैं
विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया है कि भारत किसी भी कीमत पर काव्य नीति नहीं बदलेगा
भारत पाकिस्तान काव्य वार्ता आज फिर विफल हो गई
पाकिस्तान का कहना है कि इक़बाल, मंटो, और फ़ैज़ से भारत अपना दावा वापस ले
चीन ने आज फिर ने काव्यलंकारों का परीक्षण किया
सूत्रों का कहना है कि यह अलंकार फ़िलहाल दुनिया के सबसे शक्तिशाली
काव्य संकलन पैदा करेंगे
भारत के प्रमुख काव्य निर्माता आशिक़ आवारा जी का आज तड़के निधन हो गया
उत्तरप्रदेश में आज फिर दलित कवियों पर हमला
उधर खेलों में भरत में लगातार तीसरी बार
कविता अंत्याक्षरी का स्वर्ण पदक जीत लिया है
भारत ने सीधे सेटों में ६-५, ६-४, ७-२ से यह मैच जीता
समाचार समाप्त हुए!
आ गया आज का हिंदू, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, प्रभात ख़बर
युवाओं पर चढ़ा पोएट हेयर स्टाइल का बुख़ार
कवयित्रियों से सीखें ह्रस्व दीर्घ के राज़
३० वर्षीय एमपीए युवक के लिए घरेलू, कान्वेंट एजुकेटेड, संस्कारी वधू चाहिए
२५ वर्षीय एमपीए गोरी, स्लिम, लम्बी कन्या के लिए योग्य वर सम्पर्क करें
गुरु मज़ा आ रहा है
सुनाते रहो
अपन तो हीरो हो जाएँगे
जहाँ निकलेंगे वहीं ऑटोग्राफ़
जुल्म हो जाएगा गुरु
चुप बे
थर्ड डिविज़न एम ए
एमपीए की फ़ीस कौन देगा?
प्रूफ़ कर बैठ के
ख़ाली पीली बकवास करता है!"

Wednesday, 3 August 2016

‘कल्‍पना’ पत्रिका के संदर्भ में नामवर सिंह से बातचीत


                                                                  

प्रश्‍न- भाषा के विकास में 'कल्‍पना' पत्रिका की क्‍या भूमिका रही है?
उत्तर -'कल्‍पना' के प्रधान संपादक आर्येंद्र शर्मा थे। ये संस्‍कृत के विद्वान एवं इनकी हिंदी भाषा पर अच्‍छी पकड़ थी। हिंदी को राजभाषा बनाने के क्रम में या उसके बाद हिंदी भाषा के विकास की तरफ लोगों का काफी ध्‍यान जाने लगा था। 'कल्‍पना' में उसी समय 'यह बेचारी हिंदी' नाम से एक स्‍तंभ शुरू हुआ जिसकी उस समय जरूरत थी। इस दिशा में वह स्‍तंभ काफी महत्त्वपूर्ण रहा। उन्‍होंने उस समय के रचनाकारों द्वारा जो शब्‍द-प्रयोग किए जाते थे उसे पूर्णत: व्‍यवस्थित करने का प्रयास किया। मुझे स्‍मरण है, 'सरस्‍वती' में एक 'अ‍नस्थि‍रता' का विवाद चला था, और अंतत: द्विवेदी जी को इसमें हार माननी पड़ी थी। बालमुकुंद गुप्‍त जी उस समय सही थे कि स्थिर का अनस्थिर नहीं होता है। 'अन' का प्रयोग वहाँ होता है जब शब्‍द स्‍वर से शुरू हो। उस समय भाषा के विकास में सरस्‍वती पत्रिका के माध्यम से महावीर प्रसाद द्विवेदी ने जो भूमिका निभाई उसे आर्येंद्र शर्मा ने आगे बढ़ाया जिसकी तरफ अन्‍य पत्रिकाओं का ध्‍यान नहीं जा रहा था। साहित्यिकता के स्तर पर यदि देखा जाय तो उस दौर में 'कल्‍पना' से बेहतर अन्‍य कोई पत्रिका नहीं थी। कुल मिलाकर देखें तो भाषा एवं साहित्य को लेकर जो काम 'सरस्‍वती' पत्रिका का रहा, उसी को 'कल्‍पना' ने आगे बढ़ाया।
प्रश्‍न- साहित्य की लगभग सभी विधाओं को 'कल्‍पना' ने जगह दी है। विधागत स्‍तर पर देखें तो 'कल्‍पना' ने किस विधा को ज्‍यादा महत्त्व दिया?
उत्तर-'कल्‍पना' सभी विधाओं की बड़ी संतुलित पत्रिका थी। उसका हर विधाओं पर समान फोकस था। उसने हर विधा को महत्त्व दिया। ऐसा नहीं है कि वह केवल आलोचना प्रधान पत्रिका थी। इसमें कहानी, कविता एकांकी, उपन्‍यास, निबंध, संस्‍मरण सभी विधाओं को समान जगह मिली है, यही उस पत्रिका की खासियत भी थी। यहाँ तक कि इसने दूसरी भाषा की कृतियों को भी अनुवाद के रूप में सामने लाने का पूरा प्रयास किया है।
प्रश्‍न- 'कल्‍पना' में लगभग सभी विधाएं एक साथ छप रही थी। आज इस तरह की पत्रिकाओं का अभाव क्‍यों है?
उत्तर- देखिए, इसके संपादक बद्रीविशाल पित्ती लोहिया जी के शिष्‍य थे। लोहिया जी हिंदी प्रेमी थे, संपन्‍न आदमी थे। एक ऐसा आदमी जो पैसे वाला हो, भाषा साहित्य में रुचि रखता हो तो निश्चित रूप से पत्रिका को बेहतर रूप दे सकता था और दिया भी। यह बिजनेस के लिए नहीं निकाल रहे थे। इनका उद्देश्‍य भाषा और साहित्य का विकास करना था, उसी दिशा में उन्‍होंने काम किया। इस तरह का काम आज की पत्रिकाएं नहीं कर पा रही हैं, उनमें कुछ न कुछ कमियाँ जरूर हैं, जिनकी तरफ लोगों का ध्यान  नहीं जा रहा है। इस पर आज सोचने की जरूरत है।
प्रश्‍न- 'कल्‍पना' ने किन-किन साहित्यिक आंदोलनों को (जैसे- नई कविता, नई   कहानी   आदि) विकसित करने में अपनी भूमिका निभाई?
उत्तर-यह पत्रिका किसी आंदोलन से नहीं जुड़ी हुई थी, न ही नई कहानी, न ही नई  कविता। पित्ती जी समाजवादी पार्टी से संबद्ध थे साथ ही लोहिया जी के हिंदी प्रेम से भी प्रभावित थे। वह किसी साहित्यिक मण्‍डली, दल या आंदोलन के साथ नहीं थे, यह सच है। यह उस दौर की महत्त्वपूर्ण पत्रिका थी जिसका अखिल भारतीय रूप था।
प्रश्‍न- स्‍थायी स्‍तंभों के माध्‍यम से इस पत्रिका ने अपने समय के जिन सवालों को उठाया, वे कितने महत्‍वपूर्ण थे?
उत्तर- साहित्यिक स्‍तंभों में 'साहित्यधारा' वाला कॉलम बहुत ही महत्त्वपूर्ण था। उसमें समकालीन साहित्य की टिप्‍पणियाँ होती थी। शायद इस कॉलम को मारकण्‍डेय ही लिखते थे। स्‍तंभों को लेकर यदि देखा जाय तो पूरे साहित्यिक पत्रिकाओं में जो स्‍थान इस पत्रिका का रहा है, इतनी यादगार पत्रिका अभी तक नहीं निकली।
प्रश्‍न- अगर वैचारिकी की बात करें तो इसमें कई विचारधाराओं के लोग एक साथ छप रहे थे, अगर इस दृष्टि से आप इस पत्रिका को देखें तो क्‍या कहेंगे?
उत्तर-हाँ, एक प्रकार से देखा जाय तो यह पूर्णत: संपादक के ऊपर निर्भर होता है कि वह अपनी पत्रिका को किसी एक विचारधारा या गुट तक सीमित न करके उसे लोकतांत्रिक और उदार दृष्टि से देखता है। यह चीजें  'कल्‍पना' में थी। यही कारण है कि विभिन्‍न विचारों एवं प्रवृत्तियों के लोग इसमें सहयोग करते थे। यह उसकी सफलता थी। साहित्यकारों में जो मतभेद थे, वे अपनी-अपनी  जीवन-दृष्टि एवं शैली के थे इसलिए लोगों को इसमें आपत्ति नहीं थी। यह एक मंच जैसी थी। लोग इसमें सहयोग करते थे। लोगों में मतभेद जरूर थे लेकिन कटुता नहीं थी। उस समय किसी की ईमानदारी पर शक करना या किसी भी तरह की गुटबाजी नहीं थी।
प्रश्‍न- अनुदित कृतियों को 'कल्‍पना' ने जिस तरह से महत्त्व दिया है, उस तरह आज की पत्रिकाएँ  अनुदित कृतियों के प्रकाशन से विमुख क्‍यों होती जा रही हैं?
उत्तर- इ‍सलिए कि यहाँ कहानियाँ और अन्‍य विधाओं में लिखने वाले बहुत हैं और जो विदेशी भाषा की रचनाएं हैं, उनको लोग पुस्‍तकाकार छाप रहे हैं। ऐसा नहीं कि विदेशी साहित्य का हिंदी में अनुवाद नहीं हो रहा है, हो रहा है। कविताओं, कहानियों, उपन्‍यासों आदि का खूब अनुवाद हो रहा है। वह ज्‍यादातर पुस्‍तकाकार छप रही हैं, कुछ एक पत्रिकाओं में भी छप जाती हैं।
प्रश्‍न- जैसे उस दौर में बहुत सी महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ निकल रही थी। (सारिका, धर्मयुग, आलोचना जिसके आप प्रधान संपादक भी हैं) जिस तरह से 'कल्‍पना' अनेक विधाओं का समायोजन करके चल रही थी, उस तरह की चीजें आज की पत्रिकाओं में क्‍यों नहीं आ पा रही हैं?
उत्तर- हाँ, कल्‍पना एक संपूर्ण पत्रिका थी लेकिन अब अलग-अलग विधाओं के लिए अलग-अलग पत्रिकाएँ हो गई हैं। जैसे 'हंस' है- मुख्‍यत: कथा की पत्रिका। 'आलोचना' मुख्‍यत: आलोचना के लिए हो गई है...आदि। इस प्रकार देखे तो जब अलग-अलग विधाओं के लिए अलग-अलग पत्रिकाएँ प्रकाशित होने लगी तो पहले जैसी ('कल्‍पना' जैसी) स्थितियाँ खतम हो गई। आज विभिन्‍न राजधानियाँ भी अपने-अपने प्रदेश की स्‍वतंत्र पत्रिकाएँ निकाल रही हैं,  और अच्‍छी पत्रिकाएँ निकल रही हैं।
प्रश्‍न- इसके अलावा  'कल्‍पना' अन्‍य पत्रिकाओं से किस प्रकार अलग हैं?
उत्तर- 'कल्‍पना' एक मुकम्‍मल पत्रिका थी जिसमें कविता, कहानी उपन्‍यास आलोचना प्रमुखता से एक साथ छपते थे। यहाँ तक कि इसके संपादकीय भी कुछ महत्‍वपूर्ण होते थे। साहित्य की विभिन्‍न मासिक गतिविधियों के अतिरिक्‍त इसमें अनुदित कृतियों एवं स्‍तंभों का भी प्रमुख स्‍थान था। 'सरस्‍वती' की तरह यह भी एक मुकम्‍मल पत्रिका थी। यानी कहना चाहिए कि कुछ पत्रिकाएं जो मुकम्‍मल होती हैं, जैसे 'सरस्‍वती' के बाद प्रेमचंद की पत्रिका 'हंस' थी। बहुत अच्‍छी पत्रिका थी, उसी तरह से 'कल्‍पना' थी। ऐसी कई और पत्रिकाएँ हैं जिनका स्‍मरण करना तो संभव नहीं है लेकिन स्‍वाधीनता के बाद हर प्रदेशों से महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ निकली। जैसे-उदयपुर से -'मधुमती' भारत भवन से 'पूर्वग्रह आदि। इस प्रकार से हम देखें तो 'कल्‍पना' पत्रिका भी एक अलग लीक पर चलने वाली पत्रिका थी जिसका हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं में महत्त्वपूर्ण स्‍थान है।
प्रश्‍न- इतनी महत्त्वपूर्ण पत्रिका होने के बावजूद ऐसे कौन से कारण थे जिससे कल्पना 1975-76 तक जाते-जाते निष्क्रिय होने लगती है और अंतत: बंद हो गई?
उत्तर-इसके संपादक को लगने लगा कि 'कल्‍पना' अब अपना काम कर चुकी है। उन्‍हें लगा कि अब यह पत्रिका अपना वही स्‍तर कायम नहीं रख सकेगी एवं जिस स्‍तर की पत्रिका हमने निकाल दी है अब उस स्‍तर की हम रक्षा नहीं कर सकते है, तो इसको बंद करना ही बेहतर समझा। मसलन कहानी, कविता आलोचना की अलग-अलग पत्रिकाएँ छपने लगी यहाँ तक कि कई शोध पत्रिकाएँ भी निकलने लगी तो 'कल्‍पना' के (संपादक) ने  देखा कि अब पत्रिकाएँ तो अपना काम कर रही हैं। इस होड़ में 'कल्‍पना' का पहले जैसा तेवर नहीं रहेगा। इसलिए उन्होंने  ऐसे समय में इसे को बंद करना ही समझदारी समझी और कोई बात नहीं थी।


लेखकीय परिचय- 



प्रदीप त्रिपाठी, शोध-अध्येता
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
        मोब. 08928110451

Monday, 11 July 2016

जिजीविषा के कथाकार अमरकांत


            
आलोचकों द्वारा अब तक नई कहानी में कहानी-त्रयी के रूप में जिन तीन नामों (मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव) की चर्चा करते हुए इसे सीमित दायरे में बांधकर देखा जाता रहा है, वह कहीं न कहीं एकांगी दृष्टिकोण का परिचायक है। इसी दौर में, प्रेमचंद की परंपरा से आने वाले ऐसे कई महत्त्वपूर्ण रचनाकार (अमरकांत, शेखर जोशी, मार्कण्डेय, भीष्म साहनी, रेणु आदि) हुए जिन्होंने न सिर्फ कहानी विधा को समृद्ध किया बल्कि उसे नई दिशा एवं गति प्रदान करने में भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाई है बावजूद इसके नई कहानी की चर्चा के क्रम में वे हमेशा हाशिये पर ही रहे । इनमें एक प्रमुख नाम अमरकांत का भी आता है। निश्चित रूप से अमरकांत की रचनाशीलता का दायरा बहुत ही व्यापक है। उन्होंने लगभग दस उपन्यास एवं सवा सौ से अधिक कहानियाँ लिखी हैं। यहाँ मैं अमरकांत की कुछ चर्चित कहानियों के आलोक में उनकी जनपक्षधरता, प्रतिबद्धता एवं महत्त्व को  रेखांकित करने की कोशिश करूंगा।
            अमरकांत मुख्यतः स्वतंत्र भारत के जटिल यथार्थ और द्वन्द्वों से घिरे समाज के जीवन-व्यापार और उसमें निर्मित हो रहे किरदारों को अत्यंत सहजता से पेश करने वाले रचनाकार हैं। अमरकांत की रचनाशीलता की सबसे प्रमुख विशेषता है कि उन्होंने अपनी रचनाओं के लिए वही भूमि चुनी जिसमें वे जी रहे थे। स्वाधीनता के बाद संयुक्त परिवारों का विघटन, आर्थिक बदहाली, देश-विभाजन, बेरोजगारी, संत्रास, कुंठा, भ्रष्टाचार एवं अवसरवादिता जैसी तमाम अराजक स्थितियों के गहराने से जनता के मन में असंतोष एवं मोहभंग जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होने लगी थी। रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाओं के न मिलने से आजादी के बाद आम आदमी का मन एवं उनके सजोए हुए सपने टूटने लगे थे। ऐसी निराशा के बीच अमरकांत ने इसी यथार्थ को अपनी रचनाओं के केंद्र में रखा।
            मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय समाज का चित्रण, शोषण के शिकार पात्रों की चारित्रिक जटिलता, मनोवैज्ञानिकता, विसंगतिबोध (एब्सर्डिटी), स्त्री-शोषण आदि जैसे विषय अमरकांत की रचनाओं  के केंद्र में हैं। जिंदगी और जोंक अमरकांत की सर्वाधिक चर्चित एवं महत्त्वपूर्ण कहानी है। देखा जाय तो कहानी के शीर्षक से ही यहाँ बहुत सारी चीजें स्पष्ट हो जाती हैं। कहानी के मुख्य पात्र रजुआ के माध्यम से एक संघर्षरत आदमी के जीवन एवं उसकी जिजीविषा को रेखांकित करते हुए अमरकांत ने सामंती व्यवस्था की अमानवीयता एवं मूल्यहीनता पर गहरा प्रहार किया है। रजुआ समाज द्वारा हर प्रकार से शोषित है। चोरी का झूठा आरोप लगाकर लोग उसे पीटते हैं। मनमाना काम लेकर उसे गैर वाजिब मजदूरी देते हैं। रजुआ अपनी कमाई के जो भी दस-पाँच रूपए जमा किया रहता है अंततः वह भी उसे वापस नहीं मिलता है। कहानी में उद्धृत यह लोकोक्ति ही - नीच और नीबू को दबाने से ही रस निकलता है पूरे समाज की मानसिकता एवं अमानवीयता की कलई खोल देती है। रजुआ की पीड़ा, केवल जीवन जीने की पीड़ा नहीं है बल्कि आज की सामान्य जिंदगी के समाजीकरण की पीड़ा है।  
            अमरकांत कहानी की यथार्थवादी परंपरा के सिद्धहस्त रचनाकार हैं। इनकी कहानियों में जिंदगी की अचूक पकड़ है। यही कारण है कि इनकी कहानी के पात्रों का वास्तविक जीवन से गहरा मेल बैठता है। ‘हत्यारे’ अमरकांत की बहुचर्चित कहानियों में से एक है। यह मुख्य रूप से स्वाधीन भारत में नौजवानों की स्थिति पर लिखी गई अद्भुत कहानी है। इस कहानी का वैशिष्ट्य अन्य कहानियों के बरक्स पूर्णतया भिन्न है।  हत्यारे कहानी के पात्र मोहभंग से उत्पन्न विकृति एवं मूल्यांध मानसिकता के प्रतीक पात्र हैं। इस कहानी के केन्द्रीय पात्र दो युवक हैं जो संवेदनशून्य समाज के अद्भुत नमूने हैं। यह पात्र मुख्य रूप से वर्तमान युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं जो न सिर्फ एक व्यक्ति की ह्त्यारे हैं बल्कि विवेक शून्य जीवन-मूल्यों के भी हत्यारे हैं। यह कहानी मूलतः वर्तमान समय में युवा पीढ़ी के मानसिक विघटन एवं कुंठित व्यक्तित्व को रेखांकित करती है।
            ‘डिप्टी कलक्टरी अमरकांत की बहुचर्चित कहानी है। काबिलेगौर है कि अमरकांत की कहानियों के निम्न मध्यवर्गीय पात्र जीवट, संघर्षशील व जिजीविषा से लैस हैं। तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद शकलदीप बाबू अपने कर्तव्यों से नहीं चूकते हैं बल्कि उससे जूझते हुए संघर्ष करते हैं। वह कर्ज लेकर अपने लड़के नारायण को डिप्टी कलक्टरी की परीक्षा में शामिल करवाते हैं। उन्हें ईश्वर और भाग्य को छोड़कर किसी पर विश्वास नहीं है। वे मंदिर जाते हैं। ईश्वर को प्रसाद चढ़ाकर मन्नत भी मानते हैं। बेटे को प्रसाद देते वक्त यह भी कहते हैं कि - “बेटा इसे श्रद्धा से खा लेना, भगवान शंकर का प्रसाद है।” गौरतलब है कि आर्थिक कठिनाइयों से जर्जर शकलदीप बाबू यहाँ भाग्यवादी हो उठते हैं। नारायण को कठिन परिश्रम करते देखकर वे प्रसन्न अवश्य होते हैं पर उसके सफल होने का भरोसा उन्हें बिल्कुल नहीं है। कहानी के अंत तक जाते-जाते शकलदीप बाबू के सारे सपनों पर अंततः पानी फिर ही जाता है। दरअसल स्वतन्त्रता संग्राम ने देश की पीड़ित जनता के मन में यह स्वप्न जगा दिया था कि स्वाधीनता के बाद हम सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से पूर्णतः स्वतंत्र होंगे, हमारी सारी विपन्नताएँ दूर होंगी, वे सारे के सारे सपने धरे के धरे रह गए इसी मोहभंग की एक सूक्ष्म तस्वीर अमरकांत ने अपनी इस कहानी में खीचने की कोशिश की है।  
            आजादी के बाद हिन्दी कहानी में नई कहानी का जो आंदोलन उभरा उसमें स्वातंत्र्योत्तर काल की मोहभंग की स्थिति तथा संत्रास मुखरित हुआ है। इसके आलोक में अमरकांत अपनी रचनाओं में हर प्रकार के छद्म, ढोंग, सामाजिक विसंगतियों और परिवेशगत अंतर्विरोधों की पड़ताल करते हुए एक बेहतर समाज रचना के लिए लेखक की सक्रिय भूमिका और साझेदारी की बात करते दिखाई देते हैं। इनकी रचनाओं की पृष्ठभूमि में सहज मानवीय यथार्थवादी संवेदना है जो बगैर किसी कलात्मकता के पाठकों को अभिभूत कर देती है।  नई आर्थिक परिस्थितियों से संघर्ष करता मध्यवर्गीय समाज उसकी यातनाओं एवं जीवन की भूख का जैसा हृदयस्पर्शी चित्रण अमरकांत ने किया है, वह हिन्दी कथा साहित्य में अप्रतिम है। अमरकांत ने अपनी रचनाओं में सीधे-सपाट वर्णन करने की उस शैली का प्रयोग किया है जिसे हम प्रेमचंद की परंपरा अथवा उसकी अगली कड़ी के रूप में देख सकते हैं। उन्होंने सामाजिक विसंगतियों, विडंबनाओं एवं अंतर्विरोधों को जैसा देखा व महसूस किया उन्हें अपनी कहानी की घटनाओं, स्थितियों व पात्रों में मूर्त करके ठीक उसी प्रकार से वास्तविकता को पारिभाषित किया है। इस संदर्भ में यहाँ अमरकांत की चर्चित कहानी दोपहर का भोजन का उल्लेख करना बेहद समीचीन है। इस कहानी में जिस निर्ममता एवं बारीकी के साथ समूचे निम्न मध्यवर्गीय परिवार के त्रासद अभावों को अंकित किया गया है वह अपने समय सापेक्ष प्रासंगिक होने के नाते आज भी इस कहानी का ऐतिहासिक महत्व है। इस वर्ग के पात्रों में सहनशीलता तथा भविष्य के प्रति आशा देखने को मिलती है। कहानी में रामचंद्र अपनी माँ सिद्धेश्वरी से वर्तमान स्थिति के सुधरने की आशा व्यक्त करते हुए कहता है- “समय आने पर सब ठीक हो जाएगा।” कहानी की स्त्री पात्र सिद्धेश्वरी आर्थिक विपन्नता की स्थिति में भी परिवार की हिम्मत बंधाती रहती है। उन्हें  मानसिक रूप से टूटने नहीं देती। एक प्रकार से देखें तो ‘दोपहर का भोजन’ कहानी मूलतः अमानवीय व्यवस्था के प्रति तीखा व्यंग्य है।         
अमरकान्त अपनी कहानियों में वस्तु विन्यास को इतने सहज ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि वह आम पाठक तक पूरी तरह संप्रेषित हो सके। जिस प्रकार से उनकी कहानियों की भाषा बेहद सहज और सरल है उसी प्रकार शिल्प-विधान भी अनगढ़ एवं सहज प्रतीत होता है। उनकी कहानियों के शिल्प की सबसे बड़ी खूबी उनकी अनुभूतिगत सच्चाई और सरलता है। गौरतलब है कि अमरकान्त ने कथानक या व्यंग्य की सहज कला की रोचकता को नई रोचकता के साथ प्रस्तुत किया। अमरकांत की ‘बस्ती’, ‘मूस, कुहासा, ‘नौकर’,‘लड़का-लड़की’ एवं पलाश के फूल जैसी तमाम ऐसी कहानियां हैं जो न सिर्फ स्वाधीन भारत की विसंगतियों एवं विडंबनाओं की तस्वीर पेश करती हैं बल्कि मौजूदा समाज-व्यवस्था पर गहरा प्रहार भी करती हैं।
जाहिर है, अमरकान्त की कहानियों का फ़लक अत्यंत विस्तृत है और वह लेखक के परिवेश से गहरे रूप से जुड़ी हुई है। अमरकांत उन रचनाकारों में से एक हैं जिनकी कहानियाँ न सिर्फ कथ्य और शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ हैं अपितु हमारे समय एवं समाज का प्रामाणिक दस्तावेज़ है।
  

                                               

लेखकीय परिचय-



       प्रदीप त्रिपाठी   
शोध-अध्येता एवं स्वतंत्र लेखक@ देश-दुनिया
मोबाइल- 08928110451

Saturday, 30 January 2016

कलम, आज उनकी जय बोल...



 “सुनूँ क्या सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा, स्वयं युगधर्म का हुँकार हूँ मैं 
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का, प्रलय गांडीव की टंकार हूँ मैं...
भारतीय जनमानस के दमित आक्रोश को स्वर देने वाले रामधारी सिंह दिनकर को युग कवि होने का गौरव प्राप्त है। दिनकर की रचनाशीलता का फ़लक न केवल अत्यंत विस्तृत है बल्कि बहुआयामी भी है। उनके लेखन में अनुभूतियों विचारों और शिल्प के जितने भी रूप उभरते हैं, उसे किसी वाद, विचारधारा या प्रवृत्ति में आबद्ध नहीं किया जा सकता। दिनकर की रचनाओं में आत्मविश्वास, आशावाद, संघर्ष, राष्ट्रीयता एवं भारतीय संस्कृति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। सही अर्थों में दिनकर चेतना एवं विश्वास के कवि हैं।  हस्तक्षेप कवि का गुणधर्म है।
लगातार यह सवाल उठाया जाता रहा है कि क्या दिनकर का लेखन उनके कवि मानस की सहज प्रवृत्ति है या किन्हीं दबावों से वह उनकी रचनाधर्मिता पर आरोपित हुई है? समीक्षकों द्वारा उन्हें युगचारण की भी संज्ञा दी गई। हालांकि इससे पूरी तरह से सहमत होना तो संभव नहीं ही है पर कुछ हद तक खारिज करना भी असंगत जान पड़ता है।  यदि हम समग्रता में दिनकर जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का मूल्यांकन करें तो पाएंगे कि उनका मूलभूत व्यक्तित्व एक प्रेमी का व्यक्तित्व है।  दिनकर ने स्वयं चक्रवाल की भूमिका में लिखा है- “मेरी राष्ट्रीय कविताओं और मेरे जीवन के बीच एक प्रकार की भिन्नता रही है...राष्ट्रीयता मेरे व्यक्तित्व के भीतर से नहीं जन्मीं, उसने बाहर से आकर मुझे आक्रांत किया। ” वास्तव में दिनकर की राष्ट्रीयता भाववादी राष्ट्रीयता है जिसमें चिंतन की अपेक्षा आवेग और आक्रोश ही प्रधान है। गुलामी के परिवेश में अंग्रेजों के शोषण की प्रतिक्रिया का शक्तिशाली रूप दिनकर के काव्य में दिखाई देता है। गौरतलब है, प्रणभंग से लेकर परशुराम की प्रतीक्षा तक दिनकर के काव्य में राष्ट्रीय चेतना किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है। हाँ, यह संदर्भ अलग है कि उनकी राष्ट्रीयता संबंधी अवधारणा में ससमय मूलभूत परिवर्तन होते रहे।  
दिनकर मिथकीय चरित्रों के सफल प्रयोगकर्ता हैं। सही अर्थों में देखा जाय तो कवि ने  अपनी रचनाओं में जिन  मिथकीय पात्रों को रचा है, वे अतीत और वर्तमान के संवादसेतु हैं। दिनकर की यह पंक्तियाँ इस बात की साक्षी हैं- “जब भी अतीत में जाता हूँ / मुरदों को नहीं जिलाता हूँ/ पीछे हटकर फेकता बाण/ जिससे कंपित हो वर्तमान।” इन पंक्तियों से ज़ाहिर है कि दिनकर की मिथकीय चेतना वर्तमान की ओर उन्मुख है।  जनमानस में नवीन चेतना का आगाज़ ही उनकी रचनाओं का ध्येय रहा है। दिनकर के कविकर्म की परिधि जितनी बड़ी है उनके साहित्यालोचन का भी फ़लक उतना ही विस्तृत है। मिट्टी की ओर (1949), अर्धनारीश्वर (1952), काव्य की भूमिका (1958), पंत, प्रसाद और मैथिलीशरण (1958), शुद्ध कविता की खोज (1966), आदि इनकी बहुचर्चित पुस्तकें हैं।  यह कहना बिल्कुल असंगत नहीं होगा कि रामधारी सिंह दिनकर जितने बड़े कवि हैं उतने समर्थ गद्यकार भी हैं।
दिनकर के व्यक्तित्व की छाप उनकी प्रत्येक पंक्ति पर है, पर कहीं-कहीं भावक को व्यक्तित्व की जगह वकृत्व ही मिल पाता है। दिनकर की शैली में प्रवाह है, अनुभूति की तीव्रता है, सच्ची संवेदना है। इनकी अधिकांश रचनाओं में काव्य की शैली रचना के विषय और 'मूड' के अनुरूप हैं। दिनकर की कविता का विशिष्ट गुण है कि जहाँ उसमें अभिव्यक्ति की तीव्रता है, वहीं उसके साथ ही चिंतन-मनन कीभी प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है। दिनकर जी जहां एक तरफ गांधीवाद को आदर्श मानते रहे वहीं दूसरी ओर वे मार्क्सवाद के भी पक्षधर थे। गांधीवाद में जहां उन्हें भारतीय चिंतन-धारा का सार दिखाई पड़ता था वहीं मार्क्सवाद, उनकी प्रगतिशील चेतना को पुष्ट करता था।  ज्ञानपीठ पुरस्कार सम्मान समारोह में सम्मानित होते समय उन्होंने कहा था- “जिस तरह मैं जवानी भर इकबाल और रवींद्र के बीच झटके खाता रहा, उसी तरह मैं जीवन भर गांधी और मार्क्स के बीच झटके खाता रहा हूँ। इसीलिए उजाले को लाल से गुणा करने पर जो रंग बनता है, वही मेरी कविता का रंग है। मेरा विश्वास है कि अंततोगत्वा यही रंग भारतवर्ष के व्यक्तित्व का भी होगा।”
रामधारी सिंह दिनकर के काव्य की एक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति है- रूमानियत। दरअसल दिनकर के काव्य का यदि हम बारीकी से अन्वेषण करें तो पाएंगे कि वे निरंतर साहित्य की तमाम प्रवृत्तियों को लेकर द्वंद्वग्रस्त रहे हैं। द्वंद्व की यही स्थिति ही उनके काव्य में अनेक अंतर्विरोधों का कारण बनी- मिटा दूंगा ब्रम्हा का लेख/ फिरा लूंगा खोया निज दाँव/ चलूँगा निज बल हो निःशंक/ नियति के सिर पर देकर पाँव। दिनकर ने अपने काव्य में जिन मूल्यों का  प्रतिपादन किया है उनमें तमाम अंतर्विरोध महसूस किए जा सकते हैं। वस्तुतः दिनकर जी मानवतावाद के समर्थक थे। वे जड़ता और निष्क्रियता को समाप्त कर आत्म गौरव की भावना को जाग्रत करने में आजीवन संलग्न रहे। उनकी रचनाएँ  तत्कालीन युग को  समग्र रूप में प्रतिबिंबित करने में समर्थ हैं। समर शेष है कविता में वे अपने समय एवं समाज का चित्र खीचते हुए अपनी प्रतिक्रिया दर्ज़ करते हैं- कुंकुम लेपूँ? किसे सुनाऊँ? किसको कोमल गान?/ तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिंदुस्तान। समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यदि हम उर्वशी को छोड़ दें तो दिनकर की अधिकांश रचनाएँ वीर रस से ओत-प्रोत हैं। भूषण के बाद दिनकर को वीर रस का श्रेष्ठ कवि होने का दर्जा प्राप्त है। उन्होंने सामाजिक, आर्थिक समानता एवं शोषण के खिलाफ कविताएं लिखी। दिनकर एक युगद्रष्टा साहित्यकार थे।  उनके व्यक्तित्व में कहीं कोई किसी भी प्रकार का छल-छद्म अथवा दिखावा नहीं था।  उन्होंने राष्ट्र के हक में कलम चलाने में कोई कोताही नहीं की- समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं/ गांधी का पीआईआई रुधिर, जवाहर पर फुँकार रहे हैं। दिनकर को उनकी उत्कृष्ट पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय  के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं उर्वशी के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी नवाजा गया। निश्चित रूप से दिनकर अपनी लेखनी एवं लेखन की वजह  से सदा स्मरण किए जाते रहेंगे। 


लेखकीय परिचय- 

 

प्रदीप त्रिपाठी 
स्वतंत्र लेखक/ शोध-अध्येता, 
      महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा 
मोबाइल- 8928110451, 
ईमेल- tripathiexpress@gmail.com