Thursday, 16 April 2015

कफ़न का सच: रत्नकुमार सांभरिया

कफ़न मुंशी प्रेमचंद की सर्वाधिक चर्चित कहानी मानी जाती है। वर्षों तक यह कहानी विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में भी रही। इस सच को भी नहीं नकारा जा सकता कि 20वीं सदी की सबसे विवादित कहानी का श्रेय भी कफ़न को ही जाता है। चर्चा और विवाद के अन्तर्द्वन्द्व पर दृष्टि डाले और कहानी को ब्राह्मणवादी नजरिये से देखें तो कहानी उत्कृष्ट है, क्योंकि धर्मशास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करते हुए कहानी में शूद्रों का चाण्डाल रूप प्रस्तुत हुआ है। प्रगतिशील दृष्टि से देखें तो कहानी निकृष्ट है, क्योंकि कहानी में अकल्पनीय अमानवीयता का बोध है।
यहां कहानी के बारे में भी थोड़ा जान लेना समीचीन होगा। 'कफ़न' प्रेमचंद की अन्तिम कहानी है, जो चांद हिन्दी पत्रिका के अप्रेल, 1936 के अंक में प्रकाशित हुई थी। प्रेमचंद ने पहले इसे उर्दू में लिखा था और उर्दू पत्रिका के 'जामियां' के दिसम्बर, 1935 के अंक में छपी थी। कुछ आलोचकों का ऐसा मत है कि कफ़न हिन्दी की मौलिक कहानी नहीं है, बल्कि उर्दू का तर्जुमा है।
कफ़न हिन्दी साहित्य जगत की एक मात्र ऐसी कहानी है, जिसके प्रकाशन की स्वर्ण जयंती 1986 में वर्ष भर मनाई गई। बुद्धिजीवियों और कथा विशेषज्ञों तथा सुधी श्रोताओं के बीच कहानी पर गोष्ठियों, संगोष्ठियों और सेमीनारों का दौर खूब चला। साहित्यिक पत्रिकाओं में विशेष लेख छपे और पूरे साल कफ़न का जश्न रहा। क्योंकि यह कहानी दलितों का मानमर्दन करती है, अतः इस आयोजन पर लाखों रूपये व्यय हुए।
कफ़न के प्रशंसकों में बहुधा वे लोग थे, जिनके पूर्वज कफ़न कहानी के पात्र नहीं थे। कहानी पाठक मन को न केवल घायल ही कर डालती है, बल्कि उसे लहूलुहान भी कर देती है।
कथ्य में व्यावहारिकता उसकी भौतिक सच्चाई की कसौटी होती है। इस भौतिक सच्चाई के बगैर कहानी बिन पंखों के पक्षी के सदृश होगी, जिसके लिए उड़ान भरना तो दूर, छटपटा कर दम तोड़ना नियति है। अपनी व्यावहारिकता के अभाव में कफन कहानी किस कदर बेदम होती जाती है, एक सिहांवलोकन।
जन्म और मृत्यु दो ऐसे शाश्वत सत्य हैं, जब मानव जाति, धर्म, वर्ग का भेदभाव भूल कर संवेदनशील और मानवीय हो जाती है, अगर कोई प्राकृतिक आपदा आड़े नहीं आए।
कहानी के अनुसार रात के समय माधव की पत्नी बुधिया अपनी झोंपड़ी में पड़ी प्रसव पीड़ा से छटपटा रही थी। दर्द के मारे जोर-जोर से कराह रही थी। असहनीय पीड़ा से पांव पटक रही थी। घीसू और माधव दोनों बाप-बेटे अर्थात् बुधिया के ससुर और पति किसानों के खेतों से चुरा कर लाये आलू झोंपड़ी के बाहर अलाव में भून कर खा रहे थे।
औरत, औरत की चाहे कितनी बड़ी दुश्मन हो, वह पिछले सभी द्वेषभाव, मनमुटाव भूल कर प्रसवपीड़ा के वक्त उसे सुलझाने जरूर पहुंचती हैं। प्रायः होता यह कि बिरादरी की बड़ी बूढ़ियां, देवरानी, जेठानी ऐसे अवसर पर गर्भवती महिला की बराबर निगरानी रखती हैं।
प्रसव का ऐसा ही एक प्रसंग 'गोदान' के 27वें भाग में आता है। गोबर झुनिया को ले कर लखनऊ आ जाता है और खुर्शेद मिर्जा की कोठरी में रहता है। गर्भवती झुनिया को वहां कोई देखने वाला नहीं है। झुनिया पूरे दिनों है, लेकिन दाई-माई का कहीं ठौर नहीं है। पूरा पेट झुनिया पर उसी मोहल्ले की चुहिया नामक एक अनजान महिला की बराबर नजर थी। वह स्त्री धर्म निभाती है-
''चुहिया गोबर से कहती है 'मैं देख लूंगी। बारह बच्चों की मां यों ही नहीं हो गई हूं। तुम बाहर आ जाओ गोबरधन, मैं सब कर लूंगी। बखत पड़़ने पर आदमी ही आदमी के काम आता है।
वह झुनिया के पास जा बैठी और उसका सिर अपनी जांघ पर रख कर उसका पेट सहलाती हुई बोली - मैं तो आज तुम्हें देखते ही समझ गई थी। सच पूछो, तो इसी घड़के में आज मुझे नींद नहींे आई।'
चुहिया स्नेह से उसके केस सहलाती हुई बोली-'धीरज धर बेटी, धीरज धर। अभी छन भर में कष्ट कटा जाता है।'
और चुहिया ने झुनिया को प्रसव पीड़ा से मुक्ति दिला दी। भारी विरोधाभास है। जहां गांव बस्ती है, बिरादरी है, परिवार है वहां तो एक दलित महिला बुधिया को प्रसव के दौरान तड़प-तड़प कर मरने के लिये छोड़ दिया जाता है। जहां शहर है, अपना कोई नहीं है, एक हमदर्द महिला को फरिश्ते के रूप में प्रस्तुत कर गैर दलित महिला झुनिया को बचा लिया जाता है। बस इसलिये न कि अपने पूर्वाग्रहों के चलते प्रेमचंद को कफन में संपूर्ण दलित जाति को जलील, काहिल और संवेदनहीन दिखाना था। घीसू और माधव सौ निखट्टू, नीच और निकम्मे थे, परन्तु बुधिया तो गांव बस्ती में आदरभावी और व्यवहार कुशल थी।
कितना दारूण है कि बुधिया प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी और मोहल्ले की औरतें उसके पास नहीं आई। यह बात निहायत बेजा है, और साक्षी है, कहानी की ये पंक्तियां- 'घीसू कहता है - मेरे नौ लड़के हुए, घर में कुछ नहीं था, मगर भगवान ने किसी न किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।'
बेड़ा पार लगाने वाली बात घीसू की स्वाभाविक दीनता हैं, ध्यातव्य है, घीसू की पत्नी के नौ लड़के हुए। उन नौ लड़कों के जन्म के वक्त घीसू की पत्नी को मोहल्ले की दाइयों या समझदार औरतों के अनुभवी हाथों ने ही प्रसव से निवृत कराया होगा। गांव में जो औरत ज्यादा बच्चे जन लेती है, उसे बच्चा जनाने के लिए 'सयानी' मान लिए जाने का विश्वास आज भी कायम है। नामुमकिन है, बुधिया के प्रसव के समय घर परिवार मोहल्ले की सयानी औरतें नहीं आएं। बुधिया के मरने के बाद उसे रोने के लिये मोहल्ले की औरतों सहित सभी लोग आ गये और घीसू-माधव के आंसू पोछने लगे।
अपनी अव्यावहारिकता के कारण कहानी की यहां सांसे टूटने लगी हैं और डायलेसिस पर आ गई है।
प्रेमचंद की अगली चूक बड़ी चुभती है। प्रेमचंद का जन्म बनारस के लमही गांव में जरूर हुआ। वे गांव में रहे भी जरूर। लेकिन उनको पढ़ते आभास होता है कि गांव की रीति-रिवाजों, परंपराओं और लोकरीतों से उनका कोई सरोकार नहीं रहा। गांव का बुनियादी ज्ञान तो दूर, उन्हें गावों के बारे में सतही बोध भी नहीं था। यही कारण है कि अपनी सधी बुनावट के कारण ग्रामीण परिवेश से अनभिज्ञ शहरी लोगों को उनकी कहानियां आश्चर्य का चौध पैदा करती है, वहीं ग्रामीण लोगों को बिन सिर-पैर की लगती है। कैसे ?
प्रेमचंद घीसू और माधव पिता-पुत्र दोनों को मृत बुधिया के लिये कफन लाने भेजते है। मृृत्यु जैसे अवसरों पर भाई-बन्धु, सगे-संबंधी मृतक के परिजनों को सांत्वना देते हैं। उनको ढांढ़स बंधाते हैं। शोक संतप्त की पीड़ा से आत्मसात करते उनकी भी आंखें रोने लगती हैं। अगर ऐसे गमगीन अवसर पर मृतक के परिजन कफन लाने के लिये जाना भी चाहें तो उन्हें बिल्कुल भी नहीं जाने दिया जाता है। कफ़न लाने का काम रिश्तेदार या खून का रिश्ता रखने वाले करते हैं। प्रायः उस समय कफन के पैसे भी नहीं मांगे जाते। फिर घीसू और माधव का फाका सर्वज्ञात था।
प्रेमचंद ने घीसू और माधव को कफ़न के लिये भेज कर लोक की खिल्ली तो उड़ाई ही है, गांव की चमार जाति को निष्ठुर, निर्दयी और नाकारा साबित करने का दुःसाहस भी किया है। बाप-बेटे को गांव के जमींदार के यहां बुधिया के कफन के लिये चंदा करने भिजवाते हैं। जहां अन्य साहित्यकार जमींदारों को शोषक का पर्याय मान रहे थे, वहीं प्रेमचंद उन्हें दयालु प्रवृत्ति का होना सिद्ध कर रहे थे। यहां प्रेमचंद ने जमींदारी का बड़ी श्रद्धा से यशोगान किया है। जमींदार घीसू की ओर दो रूपये फेंक देते हैं। चंदा बटोरते-बटोरते दोनों के पास पांच रूपये इकट्ठा हो जाते हैं, कहना होगा कि 70 वर्ष पहले यह एक बहुत बड़ी रकम थी।
घीसू और माधव कफ़न के लिये मांगी गई इस रकम को लेकर बाजार गये। बाजार में वे कफन नहीं खरीदने के मन में यूं ही इधर-उधर टटपोले मारते फिरते हैं, खाते-पीते हैं और रात होने का इंतजार करते हैं, ताकि सस्ते से सस्ता कफन खरीद सकें। उनके चेहरे पर इस बात की रंज भी नहीं है कि घर में दो लाशें (बुधिया और उसके पेट का बच्चा) पड़ी हैं। लोकव्यवार में कफ़न खोर को मांसखोर से ज्यादा पतित माना जाता है।
यहां रात होना कहानी का आधारभूत ढांचा है। कहानी में एक त्रासद संवाद है -
माधव बोला- 'हां, लकडी तो बहुत हैं, अब कफन चाहिये।'
'तो चलो, कोई हल्का सा कफन लें।''
'हां और क्या? लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है।'
कहानी की प्राणवायु है- 'लाश उठते-उठते रात हो जाएगी।' रात के इस शरूर से ही कहानी में क्रूरता आई है। इसी रात में घीसू और माधव कफ़न के पैसे की दारू पीते हैं और जी भर जश्न मनाते हैं। वे धर्मनिष्ठ हैं। भाग्य भगवान में उनकी आस्था है। स्वर्ग, नरक, बैकुण्ठ का उन्हें भान है। लेकिन रात के कारण निश्चित हैं।, 'लाश उठते-उठते रात हो जाएगी।'
कहानी का यही चरमोत्कर्ष है, जिसकी नींव हवा पर खड़ी है। प्रचलित लोकरीत के अनुसार मुर्दा चाहे जिसी भी धर्म, जाति, समुदाय अथवा वर्ग का हो, उसे रात में जलाया ही नहीं जाता है। अगर किसी की मृत्यु दिन छिपने पर हो जाती है, लाश को रात भर रखा जाता है और दूसरे दिन मृतक का दाह संस्कार किया जाता है। इसके दो व्यावहारिक पहलू है। धर्म की दृष्टि से यह पाप है और अनिष्ट की श्रेणी में आता है। व्यवहार की दृष्टि से रात में दाह संस्कार करने से दिवंगत का क्रियाकर्म ठीक से नहीं हो पाता है।
'लाश उठते-उठते रात हो जायगी' कहानी की जान है और यह जान इस अटल सत्य से निकल जाती है कि 'रात में लाश उठती ही नहीं है।' अब देते रहो शब्द ज्ञान और भाषा शैली के महंगे इंजेक्शन। विड़म्बना यह है कि कफ़न कहानी तक आते-आते प्रेमचंद 54-55 के वृद्ध हो गये थे, उन्हें इतना तक मालूम नहीं, रात में लाश उठती ही नहीं है। कफ़न लिख बैठे।
सारिका अक्टूबर, 1986 कें अंक में प्रो रामेश्वर शर्मा लिखते हैं - ''घीसू और माधव प्रेमचंदीय ब्राह्मण हैं। महाब्राह्मण का मृतक से रागात्मक संबंध तो नहीं होता, यहां तो मानवीय राग चेतना के संपूर्ण मूल्य को ध्वस्त कर प्रेमचंद घीसू-माधव का समर्थन करते नज़र आते हैं और उस पर तुर्रा प्रगतिशीलता का। इस कहानी में प्रेमचंद का पतन मरणोन्मुख प्रेमचंद की बुद्धि का विनष्ट हो जाना है।''
(संदर्भ- आधुनिक हिन्दी, कालजयी साहित्य पृष्ठ-67)
सवाल उठता है कि इनती गलीज कहानी लिखने के लिये प्रेमचंद ने दलितों (चमारों) को ही क्यों चुना? क्या इसकी पृष्टभूमि में किसी अन्य बड़ी जाति के गरीब पात्र नहीं हो सकते थे?
राष्ट्रीय सहारा के 8 अगस्त, 2004 के अंक में विचारक और वरिष्ठ साहित्यकार मुद्राराक्षस अपने लेख 'प्रेमचंद पुनर्पाठ क्यों नहीं ? में लिखते हैं - प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में शूद्र जाति के अनेक चरित्रों को लिया है और उनकी दर्दनाक गाथाएं कहीं हैं। यह अलग बात है कि कफ़न तक पहुंच कर उन्होंने उनके प्रति जरूरत से ज्यादा अनुकंपा कर दी। डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार 'दरिद्र शूद्र ही नहीं, ब्राह्मण भी होता है। क्या स्थिति बनती अगर कफन के पैसे से दारू और पूड़ी खाने-पीने वाले शूद्र नहीं, बा्रह्मण बाप-बेटे होते ? यह स्थिति प्रेमचंद को स्वीकार नहीं हो सकती थी। बहू के कफन की दारू वे ब्राह्मण बाप को नहीं पिला सकते थे, क्योंकि प्रेमचंद की मानसिकता के अनुसार हिन्दू दो तरह के रहे हैं। 'शुद्ध पवित्र सवर्ण और अशुद्ध गंदे शूद्र।'
प्रेमचंद की कहानियों में सार कम और अव्यावहारिकता ज्यादा है। वे ऐसे कथ्य उठाते हैं, जो निपट नाटकीय और अविश्वासी हैं और जीवन जीती जिंदगियों से मेल नहीं खाते। उनकी कोई भी कहानी अनुभव की कमी अभाव और अव्यावहारिकता की छूत से नहीं बच पाई है। शूद्रों के मामलों में उन्होंने मनुस्मृति में वर्णित सूक्तों का पूरा ध्यान रखा है। कफ़न अति है। चमार जाति कितनी निकृष्ट हो सकती है, कहानी में बस एकमात्र यही संदेश निहित है।

Tuesday, 24 March 2015

'पीके' 'फरिश्ता' की कट, कॉपी, पेस्ट

कम चर्चित साहित्यकारों के साहित्य की चोरी फिल्मी दुनिया में खूब होती है. जब मैं फिल्मीे दुनिया में आया था, मुझसे कम चर्चित उर्दू साहित्यकारों का साहित्य पढ़वाया जाता और उसको तोड-मरोड़कर इस्तेमाल कर लिया जाता...

अमलेश प्रसाद

‘‘मैंने 1 जनवरी, 2015 को पीके फिल्मी देखी तो मैं हैरान हो गया. पीके फिल्म मेरे उपन्यास फरिश्ता की कट/कॉपी/पेस्ट है.’’ ये शब्द हैं कपिल ईसापुरी के. इन शब्दों में लेखक कपिल ईसापुरी काफी मर्माहत दिखते हैं. प्रेस कांफ्रेंस कर अपना दर्द बयान करते हैं, लेकिन मीडिया में एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है- लिखता कोई है, दिखता कोई और है, बिकता कोई और है.

इस कहावत का व्यावहारिक रूप प्रसिद्ध लेखक निर्देशक बीआर इसारा विविध भारती को दिए एक साक्षात्काकर में इस प्रकार समझाते हैं- ‘‘कम चर्चित साहित्यकारों के साहित्य की चोरी फिल्मी दुनिया में खूब होती है. जब मैं फिल्मीे दुनिया में आया था, मुझसे कम चर्चित उर्दू साहित्यकारों का साहित्य पढ़वाया जाता और उसको तोड-मरोड़कर इस्तेमाल कर लिया जाता.’’

इस तरह की साहित्यिक चोरी बड़े-बड़े लेखक, निर्देशक और निर्माता तक करते हैं. हाल में आयी ब्लॉकबस्टर फिल्मी 'पीके' पर भी उपन्यासकार कपिल ईसापुरी ने अपने उपन्यास 'फरिश्ता'से कॉन्टेंट चुराने का आरोप लगाया है. एक लेखक के लिए उसके साहित्य की चोरी सबसे बड़ी क्षति ही नहीं, बल्कि उसके लिए अहसनीय दर्द होता है. विचारों की चोरी उसके लिए संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है. कपिल ईसापुरी कहते हैं, ‘‘मैंने चार जनवरी को फिल्म लेखक संघ, मुंबई में ईमेल से शिकायत दर्ज की, लेकिन वहां से पांच जनवरी को मुझे ईमेल से नकारात्मक उत्तर मिला. फिर मैंने कोर्ट में जाने का फैसला किया’’

दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कपिल ईसापुरी ने आरोप लगाया है कि उनके उपन्यास ‘फरिश्ता’ से कॉन्टेंट चुराया गया है. वे कहते हैं, ‘‘साल 2013 में छपे अपने उपन्यास ‘फरिश्ता’ में मैंने तथाकथित धर्मगुरुओं की अंधभक्ति की आलोचना की है. मैंने उपन्यास में इस बात पर विशेष जोर दिया है कि धर्म का पेशा प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव निर्मित और कृत्रिम है.’’ किसी साहित्यिक कृति का मूल विचार चुराकर केवल भाषा और शैली बदलकर एक नया साहित्य गढ़ने का धंधा शातिर लोग अक्सर करते रहते हैं.

ईसापुरी की शिकायत है कि, ‘‘फिल्म के जरिए उठाए गए विभिन्न मुद्दे मेरी किताब में से कॉपी किए गए हैं. उपन्यास में कई और भी ऐसे दृश्य हैं, जिनमें मामूली बदलाव और अनावश्यक परिवर्तन करके 'पीके' में इस्तेमाल किया गया है.’’

वकील ज्योति कालरा की मदद से दायर की गई याचिका में लेखक ने पीके फिल्म के निर्माता विधु विनोद चोपड़ा, निर्देशक राज कुमार हिरानी, स्क्रिप्ट राइटर अभिजीत जोशी और अभिनेता आमिर खान को कठघरे में खड़ा किया है. अपने उपन्यास से उन्होंने सत्रह दृश्य चुराने का आरोप लगाया है. इसमें दृश्य, संवाद और विषयवस्तु शामिल हैं.

जस्टिस नाजमी वजीरी ने फिल्म निर्माता विधु विनोद चोपड़ा, निर्देशक राज कुमार हिरानी, उनकी फिल्म निमार्ण कंपनी, पटकथा लेखक अभिजीत जोशी और अभिनेता आमिर खान से 16 अप्रैल से पहले दिल्ली हाईकोर्ट के ज्वाइंट रजिस्ट्रार के सामने अपना पक्ष रखने को कहा है.

लगभग 600 करोड़ की कमाई करने वाली 'पीके' फिल्म के निर्माताओं से लेखक ने एक करोड़ रुपये के मुआवजे के साथ-साथ अपने काम के लिए श्रेय की भी मांग की है. गौरतलब है कि कपिल ईसापुरी ने इंजीनियरिंग और पत्रकारिता की पढ़ाई की है.    (जंज्वार से साभार)

Wednesday, 25 February 2015

चंद अशआर


मुझे बता तो सही, चाँद और सूरज ही रोज ढलते क्यूँ हैं 
चाहने वाले ही, मेरे नाम से जलते क्यूँ हैं।।
कोई ख़ता गर हो तो मुझसे कह तो सही 
आखिर वो अंदर ही अंदर, घुट-घुटकर मरते क्यूँ हैं।।
तेरी ख्वाहिस है गर तो, मैं ये शहर छोड़ भी दूंगा, 
मुझे बता तो सही, लोग मेरे नाम से नफरत करते क्यूँ हैं।।
झूठा मक्कार बेईमान, भला कौन नहीं है यहाँ ?
मेरी फितरत को लोग बेईमान कहते क्यूँ हैं।।
मुझे फ़क्र है इस शहर के इन चंद ईमानदारों पर 
आखिर ये ईमानदार सब संसद में ही रहते क्यूँ हैं ।।
                                                                   __@ प्रदीप त्रिपाठी 

Tuesday, 13 January 2015

'कविता में अचानक चुप हो जाना' : प्रदीप त्रिपाठी

महापुरुषों की फसलें अब सूख गई हैं 

संताप-संलिप्त-जिजीविषाओं के विस्मृत कंठ 
खूँटे से बंधे विचारों के साथ अट्टहास करते हुए
आम आदमियों की जुगाली और जुगलबंदियों के खंडहर-बीच
अपने-अपने वजूदों के द्वंद्व में
ध्वस्त हो रहे हैं वे और हम
फिर भी
यहाँ हस्तक्षेप जैसा कुछ भी नहीं है।
कैक्टस उगाए जाने के फ़िराक में
आदमी अपनी आदमियत को भूलने लगा है 

नेपथ्य में नए नए स्वांग रचते हुए
वाक्पटुता एवं धैर्य खो देने के बीच ही
पूरी तरह घबराया हुआ आदमी
अचानक धूमिल की कविता को पढ़ते हुए हँस पड़ता है
पर
उसकी हँसी का रफ़्ता-रफ़्ता चुप्पी में तब्दील होना
मुझे कविता लिखने से अचानक रोक देता है
यह बताते हुए कि
'जितना तुम्हारा सच है उतना ही कहो'
कविता में अब लिखने जैसा कुछ भी नहीं था
क्योंकि
वह भी जानते हैं...
'मौन भी अभिव्यंजना है' ______@ प्रदीप त्रिपाठी


Friday, 9 January 2015

पीके : कुछ नए सवाल _____शैलेंद्र कुमार शुक्ल

जब दुनिया के सारे देश २१वीं सदी के १५वें वर्ष की दहलीज़ पर खड़े हैं, यह सोचना कोई जुर्म नहीं की हमने क्या खोया और क्या पाया । अमूमन देश के लोगों को सोचना भी चाहिए । भारत के कर्णधारों को भी सोचना चाहिए की, उन्होने अब तक क्या किया, अपने लिए या अपने देश के लिए ! यह बड़ा कठिन दौर है की जहां आधुनिकता ठीक से समझी ही न गई हो या समझने की कोई जरूरत ही न महसूस की गई हो, वहाँ भी उत्तरधुनिकता फूट पड़ी हो । हमारे यहाँ उच्चता के वितान रचने के लिए, ऊंची इमारत की कल्पना की जाती है, लेकिन सारी ऊर्जा नीव बनाने में ही खर्च कर दी जाती है । तो यह देश नीव भरे चबूतरों की बाजार बनता गया, और यह आज भी उसी सिद्दत से जारी है । अब आप ही बताइये वह भी कोई देश है जहां की सारी उच्चता, विशिष्टता, यहाँ तक की व्यवस्था भी कल्पना मात्र हो । कल्पनाओं का अतिरेक जब बाढ़ बन कर पूरे देश मे उमड़ रहा हो, और एक भी इच्छा पूरी होने का सवाल न हो, तो भावनाओं का कुंठित होना कोई बड़ी बात नहीं ।ऐसे भौतिक जीवन से ऊब कर लोगों की वृत्ति का आध्यत्मिक हो जाना, और सदियाँ बीत जाने के बाद भी आध्यात्मिक ही बने रहना कई सवाल मन मे खड़े करता है । हमारा भारतीय समाज धार्मिक कुहरे से घिरा हुआ समाज है जहां यथार्थ का सूरज देखना गुनाह है । यह कुहरा इतना भयावह है की भय शरीर के पोर-पोर में भरा हुआ है । अब उत्तरआधुनिकता के दौर मे एक विचित्र परिवर्तन हुआ है कि भय दिखने वाले कारक भी अपने मे खूब डरे हुए हैं और भय रोगी भी कभी कभी सोचने लगे हैं कि अब वह नशा नहीं रहा जो पहले होता था । तो ऐसे ही डरे हुए हमारे समय मे एक फिल्म आती है ‘पी के’ !

राजकुमार हिरानी के निर्देशन में आई यह फिल्म अपने समय की विसंगतियों को पहचानने में एकदम सफल फिल्म है । आमिर अपनी कलात्मक ऊंचाई को बनाए रखने वाला कलाकार है, इस फिल्म ने एक बार फिर साबित किया है । एक कलाकार के किरदार मे जो संवेदनाएं होनी चाहिए यहाँ दिखाई पड़ती है । मुख्य किरदार पीके एक एलियन है किसी दूसरे ग्रह का, ऐसा इस फिल्म मे दिखाया गया है । उसका रिमोट कंट्रोल, छीनकर चोरी कर लिया जाता है , और वह एक अच्छे मार्केट वाले धर्मगुरू के पास बेच दिया जाता है , तपस्वीजी उसे शंकरजी के डमरू का टूटा हुआ मनका बताता है । चमत्कार से भक्तों को आतंकित कर तपस्वीजी धर्म का ढिढोरा पीटता है । मुख्य पात्र पीके उसे पाने की कोशिश करता है , और अपनी सीधी सरल सच्चाई से उसे पाता भी है । यही इस फिल्म की कहानी है ।
यह एक पप्रतीकात्मक ढांचा है पूरी फिल्म का जो जादुई यथार्थ का सहारा लिए हुये है । दरअसल पीके कोई दूसरे ग्रह का प्राणी नहीं, वह प्रतीक है हमारे मनुष्य होने का, जहां कोई छल नहीं, दंभ नहीं, ईर्ष्या नहीं । वह किसी धर्म, जाति, वर्ग का एजेंट नहीं, वह शिर्फ मनुष्य है । क्या इतना काफी नहीं जिंदा रहने के लिए इस दुनिया मे । वह धर्म, जाति, वर्ग की दलदल वाली दुनिया में गलती से आ जाता है । उसका रिमोट जो खो गया है कुछ और नहीं मानव की खोई हुई अस्मिता है । वह इसे पाने के लिए सतत संघर्षशील है । लेकिन यहाँ धर्म, जाति, वर्ग के दलदल मे फांसी मनुष्यता अपनी अस्मिता ही भूल गई है । यह फिल्म हमारी समेदनाओं को झकझोरने वाली सच्चाई की ओर इशारा करती है । हमने मनुष्यता के पथ पर कितनी सफल दूरी तय की है, हमे सोंचने पर मजबूर करती है यह फिल्म । किसी बड़े चिंतक का कथन है कि ‘हमने कितनी दूरी तय की है यह माने नहीं रखता, किस ओर हमारे कदम बढ़े है यह महत्वपूर्ण है’। 
इस फिल्म का एक महत्वपूर्ण पहलू है भाषा । भाषा के माध्यम से इसमे जो जीवटता आई है उसका कोई जवाब नहीं । मनुष्यता की स्वभविकता को जानने का सबसे सफल तरीका है भाषा । फिल्म का मुख्य पात्र पीके परिनिष्ठित महानगरीय हिन्दी नहीं बोलता , वह पहले राजस्थानी हिन्दी बोलता है बाद मे भोजपुरी हिन्दी । यह उसकी स्वाभाविकता का सरल गांभीर्य है । ये भाषाएँ आदि भाषाएँ हैं बनावटी ‘बोली’ नहीं । फिल्म का मुख्य पात्र मनुष्यता की स्वाभाविकता का प्रतीक है, और यह काम स्वाभाविक भाषाओं में ही संभव है । यह ध्यान देने का विषय है कि हिन्दी सिनेमा इस दौर की उत्कृष्ट फिल्मों मे स्वाभाविकता लाने के लिए परनिष्ठित हिन्दी का सहारा छोड़ भोजपुरी, अवधी, बुन्देली आदि लोक भाषाओं की ओर उन्मुख हुआ है । 
लेखकीय परिचय-
                  
      शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
(युवा फिल्म समीक्षक एवं चर्चित कवि)
‘बया’, ‘वागर्थ’, ‘संवेद’, ‘जनपथ’ और ‘परिचय’ आदि पत्रिकाओं में शोध-आलेख एवं कवितायें प्रकाशित।
संप्रति- शोधरत(पीएच.डी.), महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा ,महाराष्ट्र
ई-मेल- shailendrashuklahcu@gmail.com     
                                                                                                 


Saturday, 6 December 2014

चिल्लर नहीं है.... :(कहानी): प्रदीप त्रिपाठी


          राजू अक्सर घर के सामानों की लगभग सारी ख़रीदारी मार्केट के किसी एक ही दुकान से किया करता था। नाम था उनका मुरारी बाबू। यह मार्केट के बड़े धन्नासेठों में से एक थे। शायद इसी कारण लोग इन्हें सेठ जी भी कहा करते थे। एक दिन की बात है। दैनंदिन की भांति राजू आज भी मार्केट करने निकल गए। मुरारी बाबू को ख़रीदारी के सामानों की लिस्ट पकड़ाते हुए बोले - अरे, सेठजी जरा ये सामान पैक कर देना, और हाँ, ध्यान रहे आज थोड़ा जल्दी में भी हूँ। लिस्ट के मुताबिक मुरारी बाबू ने राजू का ख़याल रखते हुए सामान पैक कर दिए। थोड़ा जंभाई लेते हुए, हां सेठ जी कितने पैसे हुए? राजू ने पूछा। ज्यादा नहीं, बस मात्र तीन सौ पैतालीस रूपए। जेब से तीन सौ पचास रूपए निकालकर पकड़ाते हुए राजू ने कहा ये रख लो सेठजी। मुरारी बाबू 5 रुपए वापस करने के बजाय “चिल्लर नहीं है आज” ऐसा कहते हुए ये लो राजू बच्चों के लिए 5 रूपए के चॉकलेट ले जाओ आज, वही गाने की पुरानी राग अलापने  लगे जो अक्सर खुश होकर पर अलापते थे- “सखी सइयाँ त खूबै कमात है, मंहगाई डाइन खाय जात है।” राजू भी चॉकलेट पॉकेट में रखते हुए घर की ओर चला गया।
            लगभग दो-तीन दिन के बाद राजू फिर घर के सामान लेने मुरारी बाबू के यहाँ गया। सच्चाई जो भी रही हो आज भी मुरारी बाबू ‘फुटकर पैसे नहीं है’ ऐसा कहते हुए राजू को कुछ चॉकलेट बिस्किट पकड़ाकर बिदा कर दिए। राजू अब धीरे-धीरे मुरारी बाबू के इस हरकत से तंग आ चुका था। खैर! राजू को जब भी घर के सामान लाने के ऑर्डर मिलते वह मुरारी बाबू के यहाँ से ही लाता। मुरारी बाबू का ‘फुटकर नहीं है’ का यह जुमला लगभग सभी ग्राहकों के साथ था। बात जो भी हो राजू अब मुरारी बाबू द्वारा दिए जा रहे चॉकलेट और बिस्किट जैसे सामानों को खर्च न करने के बजाय उसे इकट्ठा करने लगा। धीरे-धीरे अब तक राजू के पास लगभग मुरारी बाबू द्वारा दिए गए 5 रुपए वाले 19 पैकेट बिस्किट और तकरीबन 100 चॉकलेट इकट्ठा हो गए थे।
            रोज़मर्रा की भांति राजू, आज भी मुरारी बाबू को घर के सामानों की लिस्ट पकड़ाते हुए बड़े विनम्र भाव से बोला- सेठ जी इसमें कुछ सामानों के नाम छूट गए हैं उसे मैं मुंह से ही बताय देता हूँ। थोड़ी ही देर में मुरारी बाबू ने राजू को सामान पैक हो गया है, ज़ोर की आवाज लगाई। शायद इसलिए कि राजू किसी से बात करते-करते थोड़ी दूर चला गया था। राजू थोड़ा करीब आकर हाँ, मुरारी बाबू कितने पैसे हुए? पूछा। बक पगले आज 125 ही तो हुए हैं मुरारी बाबू ने राजू की तरफ मुंह करके अपना वही पेट सांग...गुनगुनाते हुए थोड़ा और पास आ गए।
            राजू ‘अच्छा’ बोलते हुए पहले से थोड़ा और गंभीर होकर मुरारी बाबू द्वारा अब तक दिए गए 19 बिस्किट के पैकेट और पैंतीस चॉकलेट गिनकर पकड़ाते हुए बोला- ये लो सेठ जी 125 रुपए के पूरे हैं। हाँ, ठीक से गिन लेना पूरे 125 के तो हैं न, मैं थोड़ा जल्दी में हूँ। चॉकलेट और बिस्किट के पैकेट देखकर मुरारी बाबू थोड़ा सकपकाए पर...। पर वे जल्द ही अपने कारनामों पर खिसियाते हुए नॉर्मल होकर बोले लाओ ! कोई बात नहीं... बिना गिने ही बिस्किट और चॉकलेट वापस रख लिए। राजू भी घर पहुँचकर मुरारी बाबू के इस कारनामें को लोगों से साझा करते हुए ठहाके के साथ मुरारी बाबू जो गाना गाते थे गाने लगा- “सखी सइयाँ त खूबै कमात है, मंहगाई डाइन खाय जात है।”           

लेखकीय परिचय- 


                                     प्रदीप त्रिपाठी
जन्म-                             7 जुलाई, 1992    
शैक्षणिक योग्यता- एम.ए. हिन्दी(तुलनात्मक सा.), एम.फिल. हिन्दी (तु.सा.), लोक-साहित्य, एवं कविता-लेखन में विशेष रुचि  
संप्रति-   साहित्य विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, पीएच.डी. में शोधरत
प्रकाशित रचनाएँ- विभिन्न चर्चित पत्र-पत्रिकाओं (दस्तावेज़, परिकथा, अंतिम जन, वर्तमान साहित्य, अलाव आदि) में शोध-आलेख एवं कविताएं प्रकाशित और 10 से  अधिक राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तरीय सेमिनारों में प्रपत्र-वाचन एवं  सहभागिता ।
संपर्क-  साहित्य विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा
स्थायी पता-        महेशपुर, आजमगढ़, उ.प्र., 276137
संपर्क-सूत्र-           08928110451
Email-             tripathiexpress@gmail.com
लेखकीय वक्तव्य- अनुभूतियों को शब्दबद्ध करना ही मेरी रचना का ध्येय है।   

Tuesday, 2 December 2014

दलित कविता: अस्मिता और प्रतिरोध की संस्कृति

समकालीन कविता ने अपना एक विशिष्ट मुकाम  हासिल किया है जिसे देख कर यह कहा जा सकता है कि भारतीय परिदृश्य पर दलित कविता ने  अपनी उपस्थिति दर्ज करके सामाजिक संवेदना में बदलाव की प्रक्रिया तेज की है। दलित  कविता के इस स्वरूप ने निश्चित ही भारतीय मानस की सोच को बदला है। दलित कविता आनन्द या रसास्वादन की चीज नहीं है। बल्कि कविता के  माध्यम से मानवीय पक्षों को उजागर करते हुए मनुष्यता के सरोकारों और मनुष्यता के  पक्ष में खड़ा होना है। मनुष्य और प्रकृति, भाषा और संवेदना का गहरा रिश्ता है, जिसे दलित कविता ने अपने  गहरे सरोकारों के साथ जोडा है। दलित कविता ने अपनी एक विकास – यात्रा तय की है, जिसमें वैचारिकता, जीवन-संघर्ष, विद्रोह ,आक्रोश, नकार, प्रेम, सांस्कृतिक छदम, राजनीतिक प्रपंच,वर्ण- विद्वेष, जाति के सवाल ,साहित्यिक छल आदि विषय बार –बार दस्तक देते  हैं, जो दलित कविता की विकास –यात्रा के विभिन्न पड़ाव से होकर गुजरते  हैं। दलित कवि के मूल में मनुष्य होता है, तो वह उत्पीड़न और असमानता के  प्रति अपना विरोध दर्ज करेगा ही। जिसमें आक्रोश आना स्वाभाविक परिणिति है। जो दलित  कवि की अभिव्यक्ति को यथार्थ के निकट ले जाती है। उसके अपने अंतर्विरोध भी हैं, जो कविता में  छिपते नहीं हैं, बल्कि स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त होते हैं। दलित कविता का  जो प्रभाव और उसकी उत्पत्ति है, जो आज भी जीवन पर लगातार आक्रमण कर रही है। इसी लिए कहा  जाता है कि दलित कविता मानवीय मूल्यों और मनुष्य की अस्मिता के साथ खडी है। जिस विषमतामूलक समाज में एक दलित संघर्षरत हैं, वहां मनुष्य की  मनुष्यता की बात करना अकल्पनीय लगता है। इसी लिए सामाजिकता में समताभाव को मानवीय  पक्ष में परिवर्तित करना दलित कविता की आंतरिक अनुभूति है, जिसे अभिव्यक्त  करने में गहन वेदना से गुजरना पडता है। भारतीय जीवन का सांस्कृतिक पक्ष दलित को  उसके भीतर हीनता बोध पैदा करते रहने में ही अपना श्रेष्ठत्व पाता है। लेकिन एक  दलित के लिए यह श्रेष्ठत्व दासता और गुलामी का प्रतीक है। जिसके लिए हर पल दलित को  अपने ‘स्व’ की ही नहीं समूचे दलित समाज की पीड़ादायक स्थितियों से  गुजरना पड़ता है।  हिन्दी आलोचक कविता को जिस रूप में  भी ग्रहण करें और साहित्यिक मापदंडों से उसकी व्याख्या करें, लेकिन दलित जीवन  की त्रासद स्थितियां उसे संस्पर्श किये बगैर ही निकल जाती हैं। इसी लिए वह आलोचक  अपनी बौद्धिकता के छदम में दलित कविता पर कुछ ऎसे आरोपण करता है कि दलित कविता में  भटकाव की गुंजाईश बनने की स्थितियां   उत्पन्न होने की संभावनायें दिखाई देने लगती हैं। इसी लिए दलित कविता को  डा.अम्बेडकर के जीवन-दर्शन, अतीत की भयावहता और बुद्ध के मानवीय दर्शन को हर पल सामने  रखने की जरूरत पडती है, जिसके बगैर दलित कविता का सामाजिक पक्ष कमजोर पडने लगता है। समाज में रचा- बसा ‘विद्वेष’ रूप बदल–बदल कर झांसा देता है। दलित कवि के सामने ऎसी भयावह  स्थितियां निर्मित करने के अनेक प्रमाण हर रोज सामने आते हैं, जिनके   बीच अपना रास्ता ढूंढना आसान नहीं होता है। सभ्यता  ,संस्कृति के घिनौने सड़यंत्र लुभावने शब्दों से भरमाने का काम करते हैं। जहां  नैतिकता, अनैतिकता और जीवन मूल्यों के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है,फिर भी नाउम्मीदी  नहीं है। एक दलित कवि की यही कोशिश होती है कि इस भयावह त्रासदी से मनुष्य स्वतंत्र  होकर प्रेम और भाईचारे की ओर कदम बढाये, जिसका अभाव हजारों साल से साहित्य और समाज में दिखाई देता रहा  है।        दलित कविता निजता से ज्यादा सामाजिकता को महत्ता देती है। इसी लिए दलित  कविता का समूचा संघर्ष सामाजिकता के लिए है। दलित कविता का सामाजिक यथार्थ ,जीवन संघर्ष और  उसकी चेतना की आंच पर तपकर पारम्परिक मान्यताओं के विरुद्ध विद्रोह और नकार के रूप  में अभिव्यक्त होता है। यही उसका केन्द्रीय भाव भी है, जो आक्रोश के रूप  में दिखाई देता है। क्योंकि दलित कविता की निजता जब सामाजिकता में परिवर्तित होती  है, तो उसके आंतरिक और बाहय द्वंद्व उसे संश्लिष्टता प्रदान करते हैं। यहां यह  कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगा कि हिन्दी आलोचक अपने इर्द-गिर्द रचे–बसे संस्कारिक  मापदंडो, जिसे वह सौन्दर्यबोध कहता है, से इतर देखने का अभ्यस्त नहीं है। इसी लिए उसे दलित कविता  कभी अपरिपक्व लगती है, तो कभी सपाट बयानी, तो कभी बचकानी भी।  दलित कविता की अंत:धारा और उसकी वस्तुनिष्ठता को पकड़ने की वह कोशिश नहीं  करना चाहता है। यह कार्य उसे उबाऊ लगता है। इसी लिए वह दलित कविता से टकराने के  बजाए बचकर निकल जाने में ही अपनी पूरी शक्ति लगा देता है। दलित चेतना दलित कविता को एक अलग  और विशिष्ट आयाम देती है। यह चेतना उसे डा. अम्बेडकर जीवन–दर्शन और जीवन  संघर्ष  से मिली है। यह एक मानसिक  प्रक्रिया है जो इर्द-गिर्द फैले सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, आर्थिक छदमों से  सावधान करती है। यह चेतना संघर्षरत दलित जीवन के उस अंधेरे से बाहर आने की चेतना  है जो हजारों साल से दलित को मनुष्य होने से दूर करते रहने में ही अपनी श्रेष्ठता  मानता रहा है। इसी लिए एक दलित कवि की चेतना और एक तथाकथित उच्चवर्णीय कवि की चेतना  में गहरा अंतर दिखाई देता है। सामाजिक जीवन में घटित होने वाली प्रत्येक घटना से  मनुष्य प्रभावित होता है। वहीं से उसके संस्कार जन्म लेते हैं और उसकी वैचारिकता, दार्शनिकता ,सामाजिकता, साहित्यिक समझ  प्रभावित होती हैं। कोई भी व्यक्ति अपने परिवेश से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता  है। इसी लिए कवि की चेतना सामाजिक चेतना का ही प्रतिबिम्ब बन कर उभरती है। जो उसकी  कविताओं में मूर्त रूप में प्रकट होती है। इसी लिए दलित जीवन पर लिखी गयी रचनाएं  जब एक दलित लिखता है और एक गैर दलित लिखता है तो दोनों की सामाजिक चेतना  की भिन्नता साफ–साफ दिखाई देती है। जिसे अनदेखा करना हिन्दी आलोचक की  विवशता है। यह जरूरी हो जाता है कि दलित कविता को पढते समय दलित–जीवन की उन  विसंगतियों, प्रताडनाओं, भेदभाव, असमानताओं को ध्यान में रखा जाये, तभी दलित कविता के  साथ साधारणीकरण की स्थिति उत्पन्न होगी। हिन्दी के कुछ विद्वानों, आलोचकों को लगता है कि दलित का जीवन बदल चुका है। लेकिन  दलित कवि और साहित्यकार अभी भी अतीत का रोना रो रहे हैं और उनकी अभिव्यक्ति आज भी  वहीं फुले, अम्बेडकर, पेरियार के समय में ही अटकी हुई है। यह एक अजीब तरह का आरोप  है। आज भी दलित उसी पुरातन पंथी जीवन को भोग रहा है जो अतीत ने उसे दिया था। हां  चन्द लोग जो गांव से निकल शहरों और महानगरों में आये ,कुछ अच्छी  नौकरियां पाकर उस स्थिति से बाहर निकल आये हैं, शायद उन्हीं चन्द  लोगों को देख कर विद्वानों ने अपनी राय बनाली है कि दलितों के जीवन में अंतर आ  चुका है। लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है। महानगरों में रहने वालों की वास्तविक स्थिति वैसी  नहीं है जैसी दिखाई दे रही है। यदि स्थितियां बदली होती तो दलितों को अपनी  आईडेंटीटी छिपा कर महानगरों की आवासीय कालोनियों में क्यों रहना पडता। वे भी दूसरों  की तरह स्वाभिमान से जीते, लेकिन ऎसा नहीं हुआ। समाज उन्हें मान्यता देने के लिए आज भी  तैयार नहीं है। शहरों और महानगरों से बाहर ग्रामीण क्षेत्रों में दिन रात खेतों, खलिहानों, कारखानों में  पसीना बहाता दलित जब थका-मांदा घर लौटता है, तो उसके पास जो है  वह इतना कम है कि वह अपने पास क्या जोड़े और क्या घटाये, कि स्थिति में होता है। ऊपर से सामाजिक विद्वेष उसकी रही सही  उम्मीदों पर पानी फेर देता है। इसी लिए अभावग्रस्त जीवन से उपजी विकलताओं, जिजिविषायें दलित  कवि की चेतना को संघर्ष के लिए उत्प्रेरित करती हैं, जो उसकी कविता का  स्थायी भाव बनकर उभरता है। और दलित कविता में दलित जीवन और उसकी विवशतायें बार-बार  आती हैं। इसी लिए कवि का ‘मैं ‘हम’ बनकर अपनी व्यक्तिगत, निजी चेतना को  सामाजिक चेतना में बदल देता है। साथ ही मानवीय मूल्यों को गहन अनुभूति के साथ  शब्दों में ढालने की प्रवृत्ति भी उसकी पहचान बनती है। दलित कविता को मध्यकालीन संतों से  जोड़कर देखने की भी प्रवृति इधर दिखाई देती है। जिस पर गंभीर और तटस्थ विवेचना की  आवश्यकता है। संत काव्य की अध्यात्मिकता, सामाजिकता और उनके जीवन मूल्यों की  प्रासंगिकता के साथ डॉ॰ अंबेडकर के मुक्ति –संघर्ष से उपजे साहित्य की अंत:चेतना  का विश्लेषण करते हुए ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। जो समकालीन सामाजिक संदर्भो  के लिए जरूरी लगता है, जिस पर गहन चिंतन की आवश्यकता है। दलित कविता में आक्रोश, संघर्ष, नकार, विद्रोह, अतीत की स्थापित मान्यताओं से है। वर्तमान के छदम से  है, लेकिन मुख्य लक्ष्य जीवन में घृणा की जगह प्रेम, समता, बन्धुता, मानवीय मूल्यों का  संचार करना ही दलित कविता का लक्ष्य है।