Sunday, 30 November 2014

हिंदी और उर्दू का रिश्ता....

पूरे विश्व में हिन्दी और उर्दू संभवतः अकेली ऐसी भाषाएं हैं जिनके संज्ञा, सर्वनाम, क्रियापद और वाक्यरचना पूर्णतः समान होने के बावजूद उन्हें दो अलग-अलग भाषाएं माना जाता है.
कुछ लोग इसीलिए सद्भावनावश और कुछ अन्य दुर्भावनावश हिन्दी और उर्दू को एक ही भाषा की दो शैलियाँ मानते हैं और उनके बीच लिपिभेद को ही बुनियादी भेद समझते हैं क्योंकि हिन्दी को देवनागरी लिपि में लिखा जाता है और उर्दू को फारसी और अरबी के मिश्रण से बनी लिपि में. जो लोग सद्भावनावश ऐसा कहते हैं, उनका उद्देश्य दोनों भाषाओं की साझी विरासत और परंपरा को रेखांकित करना और दोनों को एक-दूसरे के करीब लाना होता है, लेकिन जो लोग दुर्भावनावश ऐसा कहते हैं उनका लक्ष्य उर्दू को भी हिन्दी की एक शैली बताकर उसे हिन्दी के भीतर ही समेट लेना है.
स्वाभाविक रूप से उर्दूवाले इन दोनों ही तरह के लोगों को संदेह की नजर से देखते हैं और इसके पीछे हिन्दीवालों की विस्तारवादी साजिश की गंध सूंघते हैं. यही नहीं, उन्हें हिन्दी प्रदेश कहे जाने वाले विशाल क्षेत्र में बोली जाने वाली बोलियों और भाषाओं को भी हिन्दी का हिस्सा मान लेने पर भी आपत्ति है. अभी हाल ही में प्रसिद्ध उर्दू लेखक और आलोचक शम्सुर्रहमान फारूकी ने इस प्रवृत्ति को हिन्दी के वर्चस्ववाद का द्योतक बताते हुए हिन्दी-उर्दू संबंध पर भी इसकी छाया पड़ने की ओर इशारा किया था. उनके इस वक्तव्य ने एक बार फिर इन जुड़वां भाषाओं के आपसी रिश्तों को विमर्श के केंद्र में ला दिया है. दरअसल इन दो भाषाओं के बीच का रिश्ता केवल भाषा या साहित्य तक ही सीमित नहीं है, इसलिए इस पर बहसें अक्सर ठोस वैचारिकता और ऐतिहासिक एवं भाषावैज्ञानिक तथ्यों तथा तर्कों पर नहीं, राजनीतिक दृष्टिकोणजनित भावावेश में की जाती हैं. उर्दू-हिन्दी संबंध पिछली चार सदियों के दौरान विकसित हुआ है और इसी कालावधि में इन दोनों के बीच दूरी बढ़ती गई है. देश के विभाजन, पाकिस्तान की मांग के साथ उर्दू का जुड़ाव और विभाजन के बाद उसका पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा एवं राजभाषा बनना भी भारत में हिन्दी के साथ उसके संबंध को प्रभावित करता रहा है. पाकिस्तान में तो हिन्दी का अस्तित्व ही नहीं है, इसलिए यह समस्या मुख्य रूप से भारत में रहने वाले हिन्दी और उर्दूभाषियों की ही है.
अमृतराय ने गहन शोध के आधार पर स्पष्ट रूप से दर्शाया है कि सत्रहवीं सदी के अंत और अट्ठारहवीं सदी के आरंभ में ही रेख्ते या उर्दू या हिंदवी में से संस्कृत मूल के शब्दों को निकाल बाहर करने की प्रवृत्ति विकसित होने लगी थी. इसलिए जब 1800 में अंग्रेजों ने कलकत्ते में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना करने के साथ ही हिन्दी और उर्दू को दो पृथक भाषाओं के रूप में अलग करके इस विभाजन की औपचारिक रूप से नींव डाली, तब तक लगभग एक सदी तक पृथकतावादी तत्व सक्रिय रह चुके थे. हालांकि आज भी रोजमर्रा के व्यवहार में बोलचाल के स्तर पर हिन्दी और उर्दू को एक-दूसरे से अलगाना बेहद मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव ही है, लेकिन उनके साहित्यिक रूप एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न हो चुके हैं. विचार की भाषा के रूप में भी आज हिन्दी और उर्दू एक-दूसरे से नितांत भिन्न हैं.

फिराक गोरखपुरी जैसे शीर्षस्थ उर्दू कवि की भी यह मान्यता थी, और इस मामले में उनके विचार अमृतराय के काफी नजदीक पड़ते हैं, कि उर्दू ने स्थानीय बोली और संस्कृति से अपना दामन बचा कर रखा जिसके कारण उसकी कविता में भारत की मिट्टी की वैसी सोंधी महक नहीं आ पायी जैसी आनी चाहिए थी. इस कारण वह शहरी अभिजात वर्ग की साहित्यिक भाषा बनकर रह गई. यदि इस दृष्टि से देखें तो हिन्दी इससे मुक्त रही है. उसने अवधी, ब्रज, मैथिली, भोजपुरी, राजस्थानी और खड़ीबोली, सबकी भाषिक और साहित्यिक संपदा को अपनाया. हालांकि जिसे आज हम हिन्दी कहते हैं, वह खड़ीबोली का ही परिष्कृत रूप है, लेकिन उसे हिन्दी प्रदेश की अन्य बोलियों और भाषाओं की साझा परंपरा और विरासत से परहेज नहीं, लेकिन इसी को शम्सुर्रहमान फारूकी हिन्दी का वर्चस्ववादी रुझान समझते हैं.
आज स्थिति यह है कि हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम में सभी स्तरों पर कबीर, रैदास, मालिक मुहम्मद जायसी, सूरदास, तुलसीदास, रहीम, रसखान और विद्यापति जैसे कवियों को शामिल किया जाता है जो खड़ीबोली के नहीं बल्कि अवधी, ब्रज, मैथिली आदि भाषाओं के कवि हैं, लेकिन उर्दू के पाठ्यक्रम में इस विरासत को स्वीकार नहीं किया जाता. अमीर खुसरो को हिन्दी/उर्दू का पहला कवि तो माना जाता है लेकिन उनके बाद के विकास का इतिहास दोनों भाषाओं में अलग-अलग है.
विडम्बना यह है कि खड़ीबोली हिन्दी में भी उसी तरह की प्रवृत्ति ने जड़ जमा ली है जिसके कारण अठारहवीं सदी और उसके बाद के काल में उर्दू से संस्कृत और स्थानीय बोलियों के शब्दों को निकाला गया. हिन्दी में संस्कृत शब्दों को अनावश्यक ढंग से ठूंसने की परंपरा चल निकली है जिसके कारण भाषा और जनता के बीच दूरी लगातार बढ़ती जा रही है. एक दूसरा बदलाव यह हुआ है कि बहुत-सा उर्दू साहित्य देवनागरी लिपि में छप कर सामने आया है और हिन्दी पाठकों के बीच लोकप्रिय हुआ है. आज मीर, गालिब, इकबाल, फिराक, फैज, इंतजार हुसैन, अहमद फराज और फहमीदा रियाज को जितना हिन्दी के पाठक पढ़ रहे हैं, उतना शायद उन्हें उर्दू के पाठक भी न पढ़ रहे हों. नतीजा यह है कि एक ओर जहां हिन्दी और उर्दू के बीच तनावपूर्ण रिश्ते बरकारर हैं, वहीं दूसरी ओर वे अपने पाठकों के जरिये एक दूसरे के नजदीक भी आ रही हैं. हो सकता है कुछ लोग इसके पीछे भी हिन्दी का वर्चस्ववाद ढूंढ लें.



Saturday, 8 November 2014

दलित चिंतकों से डरते क्यों हैं मार्क्सवादी ?

दस्तावेज बताने की कोशिश करता है कि आरक्षण एक बुर्जुआजी षड़यंत्र है जिसके चलते भारत विस्फोटक स्थिति तक नहीं पहुँच सका है! बार-बार इस तथ्य की अनदेखी क्यों की जाती है आरक्षण संघर्ष का एक रूप है और यह दलितों के संघर्ष का परिणाम है...
लेखक - विष्णु शर्मा

सर्वहारा प्रकाशन के दस्तावेज मायावती-मुलायम परिघटना और उसकी वैचारिक अभिव्यक्तियांमें सार्थक बहस कम और आत्ममुग्ध घोषणा अधिक है. यह दलित आंदोलन को सीधे तौर पर दलित बुर्जुआ बुद्धिजीवियों की अवसरवादी राजनीति घोषित कर उसके पीछे के सामाजिक कारणों को नकारती है. इस तरह यह उसी फतवेबाजीका शिकार हो जाती है, जिसके खिलाफ होने का दावा इस पुस्तिका के शुरू में है.
दलित बुद्धिजीवियों के लिए यह कहते हुए कि ये 'एक बार मुंह खोलते हैं तो चार फतवे जारी हो जाते हैंयह किताब खुद इतने फतवे जारी करती है कि तर्क कब कुतर्क और कुतर्क कब गूढ़ अर्थों वाली लाल बुझक्कड़ की पहेली बन जाते हैंसमझना कठिन हो जाता है. खुद को असलमार्क्सवादी होने की तमाम घोषणा के बावजूद दलित आंदोलन के सामाजिक कारकों को नज़रअंदाज़ कर दस्तावेज़ वैचारिक खोखलेपन का शानदार सबूत प्रस्तुत करता है. इससे आगे यह इस भूभाग के इतिहास को भी अपनी कल्पना के अनुसार रचनेकी कोशिश करता है, गोया इतिहास इस संगठन की व्यक्तिगत संपत्ति है कि जब मन करे अपने अनुसार इसकी व्याख्या कर दी जाये.
दलित बुद्धिजीवियों के दर्शन को यह किताब हास्यास्पद तौर पर बुर्जुआ दर्शन घोषित करती है, जिसका मतलब यह हो जाता है कि भारत के दलित एक तरह से नव उदयीमान पूंजीपति हैं जो भारतीय सामंतवाद के खिलाफ सारतःउसी तरह है जैसा यूरोपी सामंतवाद के खिलाफ फ़्रांसीसी बुर्जुआ दर्शनयानी वे इस बात को मानकर चलते हैं कि भारत के दलित वर्ग के पास उत्पादन के संसाधन हैं और अब वह राजनीतिक सत्ता के लिए संघर्ष कर रहा है. फ्रांस में इसी तरह का संघर्ष बुर्जुआजी ने किया था. बिना सामाजिक स्थिति पर नज़र डाले इस तरह की प्रस्तावना को प्रकट करना इतिहास के साथ अन्याय है. इस तरह यहाँ उस महत्वपूर्ण कारक की अनदेखी हो जाती है जिसके फलस्वरूप दलित राजनीति का विकास हुआ.  दलित आंदोलन मूलतः उत्पादन के संसाधनों वाले बुर्जुआजी का संघर्ष न होकर उत्पादन के संसाधनों में हिस्सेदारी के लिए संघर्ष है.
दस्तावेज भारतीय समाज को आदिकाल  से ही एक इकाई के रूप में देखने की गंभीर भूल करता है और घोषणा करता है कि यहाँ वर्गीय शोषण के लिए उस हद तक बल प्रयोग की आवश्यकता नहीं थी जैसी यूनान और रोम में. इसके बदले वर्ण व्यवस्था से काम चल गया (पृष्ठ ९).' भारत केवल मध्य भारत नहीं है, बल्कि यहाँ रेतीले रेगिस्तान और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र भी हैं और मध्यकाल तक यह एक इकाई न होकर अलग-अलग राज्य में बंटा हुआ भूभाग था.
जहाँ तक गुलामी का सवाल है तो यह बात याद कर लेना अच्छा होगा कि बुद्धकालीन और महाभारतकालीन भारतमें गुलामी ठीक उसी रूप में थी जैसा कि रोम और यूनान में. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि प्राकृतिक सम्पदा प्रचुर मात्रा में थीऔर जमीन उपजाऊ थीऐतिहासिक साक्ष्य प्रमाणित करते हैं गुलामी की व्यवस्था एक लंबे समय तक इस उपमहादीप में स्थापित थी और इसका इतिहास में ठीक वैसा ही असर था जैसा अन्य क्षेत्रों में. वर्ण व्यवस्था गुलामी के विकल्प के रूप में विकसित नहीं हुई, बल्कि इसका आधार ब्राह्मणवादी धार्मिक व्यवस्था थी. रही बात बल प्रयोग न करने की तो ऐतिहासिक साक्ष्य यह प्रमाणित करते हैं कि आदिकाल में उस वर्ग के पास, जिसका विकास दलित वर्ग के रूप में हुआ, उत्पादन से संसाधन थे और बलप्रयोग करके ही उन्हें संसाधनों से वंचित किया गया.
दस्तावेज सामंतवाद को वर्ण व्यवस्था का आधार मानने की जगह वर्ण व्यवस्था को सामंतवाद का आधार मानता है. शुरू में इस बात की घोषणा करने के बावजूद कि मार्क्सवाद हर चीज़, हर परिघटना को उसके देशकाल में अवस्थित करके देखता हैदस्तावेज भूल जाता है कि विचार का आधार व्यवस्था होती है, न कि व्यवस्था का विचार. मार्क्सवाद को स्वीकार करने के बावजूद सामंतवाद के आधार के तौर पर वर्ण व्यवस्था को देखना अत्यंत स्थूल विश्लेषण है. बिना सामंतवाद के मजबूत आधार के वर्ण व्यवस्था को बरकरार नहीं रखा जा सकता. ठीक उसी तरह जैसा पूंजीवादी आधार के बिना पूंजीवाद को और समाजवादी आधार के बिना समाजवाद को.
और जब दस्तावेज के रचियता को यह समझ आता है कि सामंतवाद ऐसी व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति की समूची हैसियत उसके जन्म के साथ तय हो जाती है’ (पृष्ठ 10) तो भारत की वर्तमान व्यवस्था को बुर्जुआजी व्यवस्था मानने के पीछे का कारण क्या है? भारत की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था क्या एक अर्धसामंती राज्य नहीं है? यदि दस्तावेज के प्रस्तावना को ठीक कह कर स्वीकार कर लिया जाए कि भारत एक पूंजीवादी राज्य है (पृष्ठ 4) तो फिर यह भी स्वीकार कर लेना ही पड़ेगा कि जाति, जिसका आधार सामंतवाद है, भी खत्म हो गई है. सच्चाई कुछ और ही बयां करती है.   
दस्तावेज की और एक कमी है बिना आधार के स्वीकार करना कि आरक्षण के माध्यम से शासक वर्ग संपत्ति की व्यवस्था में कोई आमूल-चूल परिवर्तन किये बिना अपने आधार का विस्तार करता है और अपने खिलाफ शोषितों के असंतोष को विस्फोटक स्थिति तक जाने से रोकता है’ (पृष्ठ 5). यह उसी तरह का भौंडा तर्क है जो मार्क्स के समय वह लोग देते थे जो कहते थे कि यदि मजदूर वर्ग अधिक मजदूरी की मांग करेगा तो महंगाई बढ़ेगी. दस्तावेज यह क्यों नहीं देख पाता कि दलित बुद्धिजीवियों के विकास में आरक्षण का महत्वपूर्ण योगदान है. यह सच है कि यह सम्पत्ति संबंधों पर परिवर्तन नहीं करता, लेकिन यह यह भी सही है कि यह सामाजिक संपत्ति में हिस्सेदारी को व्यापक बनाता है.
दस्तावेज को पढ़ने से पता चलता है कि अपनी तमाम बड़ी घोषणा के बावजूद ये मार्क्सवादी भी भारत के सभी मार्क्सवादियों की तरह क्रांति की आशा बुर्जुआजी से करते हैं. वे चाहते हैं कि बुर्जुआजी बिना कुछ किये बैठा रहे और स्थिति को विस्फोटक हो जाने दे, ताकि ये सब मिलकर क्रांति कर लें. क्रांति के बारे में जाने वाले लोग समझते हैं कि विस्फोटक स्थिति बनती नहीं है, बल्कि वर्ग संघर्ष के जरिये बनाई जाती है. क्या मार्क्सवाद इतना लचर है कि वह विस्फोटक स्थिति का इंतज़ार करे न कि उसका निर्माण. और यदि विस्फोटक स्थिति स्वत: निर्मित होती है तो मार्क्सवादी पार्टी की जरूरत क्या है? क्या एक क्रांतिकारी पार्टी का पहला काम स्थिति को विस्फोटक बनाना नहीं होना चाहिए?
दस्तावेज बताने की कोशिश करता है कि आरक्षण एक बुर्जुआजी षड़यंत्र है जिसके चलते भारत विस्फोटक स्थिति तक नहीं पहुँच सका रहा है! बार-बार इस तथ्य की अनदेखी क्यों की जाती है आरक्षण संघर्ष का एक रूप है और यह दलितों के संघर्ष का परिणाम है. बिना संघर्ष के क्या आरक्षण को हासिल किया जा सकता है? और आगे बढ़कर कहें तो क्या बिना संघर्ष के आरक्षण को बचाया जा सकता है?
इसलिए दलित विमर्श को बुर्जुआजी दर्शन कहकर नकारना उसे समझने की भूल है. भारतीय समाज में दलित विमर्श की उत्पत्ति सामंतवाद के खिलाफ तो है, लेकिन यह बुर्जुआजी दर्शन से उस रूप में अलग है जब वह समाज में बराबरी की बात करता है. सामाजिक और आर्थिक बराबरी को अलग-अलग करके देखना मार्क्सवाद की समझ में बुनियादी गलती है, जबकि मार्क्सवाद अंततः सामाजिक बराबरी का दर्शन है जिसका उत्कर्ष आर्थिक बराबरी में होगा. इतिहास में जितनी भी समाजवादी सत्ताओं का जन्म हुआ (मुख्यतः रूस और चीन में) वहां पहले सामाजिक बराबरी ही स्थापित हुई थी. इसलिए दलित राजनीति का विकास समाजवादी राजनीति के विकास के खिलाफ न होकर उसका आधार निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. आत्मनिर्णय के सिद्धांत की लेनिनवादी मान्यता के अनुसार एक देश के सर्वहारा को सबसे पहले विश्वभर के सर्वहारा को बराबरी से देखना होगा. यानी लेनिन भी सामाजिक बराबरी को आर्थिक बराबरी के पहले के चरण के रूप में ही देखते हैं, न कि इसके उलट. 
जब दलित चिन्तक जाति व्यवस्था को ब्राह्मण का षड़यंत्र बताते हैं तो इसका अर्थ होता है सत्ता का षड़यंत्र, क्योंकि सत्ता प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर उनके पास ही रही है. दलित राजनीति सामाजिक बराबरी के लिए ही अस्तित्व में आ सकती है, क्योंकि दक्षिण एशिया के सन्दर्भ में हम देख सकते हैं कि आर्थिक बराबरी सामाजिक बराबरी का आधार तो है, परन्तु यह उसका मूल स्वभाव नहीं है. इस तरह उनका संघर्ष दो चरणों में सामने आता है -आर्थिक और सामाजिक.
सामाजिक बराबरी का उनका संघर्ष आर्थिक बराबरी के संघर्ष के साथ और कई मामलों में इससे पहले प्रकट होता है. इसका कारण है अभी संसदीय राजनीति में इसकी संभावना पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है. ऐसे क्षेत्रों में जहाँ इससे सकारात्मक परिणाम की अब कोई संभावना नहीं है (आदिवासी क्षेत्रों में), वहां यह सशस्त्र संघर्ष के रूप में विकसित हो चुका है. यह दलित राजनीति का भविष्य भी है, क्योंकि सामाजिक बराबरी के लिए संघर्ष का विकास अंततः आर्थिक बराबरी के संघर्ष के रूप में विकसित होगा और ठीक यहीं से यह संसदीय राजनीति से ऊपर उठ जायेगा.
यदि आन्दोलन के इस रूप को पीछे धकेलकर सीधे अर्थ केंद्रित आंदोलन पर केंद्रित कर दिया जाये तो इसका असर मूलतः नुकसानदायक होगा. दलित आंदोलन को केवल बुद्धिजीवी षड़यंत्रबताकर इसके प्रगतिशील प्रस्तावना को छोड देना वैचारिक स्तर पर आत्मघाती है.
लेकिन सवाल इससे अधिक का है, वह यह कि कौन किसे जोड़ेगा? क्या मजदूर वर्ग दलित को अपने साथ लेकर क्रांति करेगा या दलित मजदूर को अपने साथ लेकर भारतीय क्रांति को पूरा करेगा? या जिसे सर्वहारा माना जा रहा है वह दलित है? क्योंकि भारतीय सन्दर्भ में सर्वहारा की परिभाषा के सबसे नजदीक दलित ही हो सकता है. इसलिए इस मायने में दलित वह शक्ति है जो इस उपमहादीप में क्रांति को अपने अंतिम चरण तक ले जा सकती है.
दस्तावेज मानता है कि अंग्रेजी शासन के कारण भारत में पूंजीवाद का उदय हुआ, जबकि तथ्य बताते हैं कि अंग्रेजी शासन ने न केवल टूटते सामंती समाज को जीवनदान दिया, बल्कि कई अवसरों में तो स्थापित किया और इसी के परिणामस्वरुप आज यह व्यवस्था बनी हुई है.  खुद मार्क्स ने भारत के बारे में लिखा है कि कच्चे माल को इंग्लैंड निर्यात कर और वहां के कारखानों में निर्मित सस्ते माल से भारतीय बाज़ार को भरकर अंग्रेजी शासन ने शुरू से ही यहाँ विकसित होते पूंजीवाद को रोकने का प्रयास किया. दस्तावेज एक फ़तवादेकर भारत को पूंजीवादी देश घोषित कर देता है और कहीं भी यह बताने का प्रयास नहीं करता कि क्यों यह पूंजीवादी देश है न कि सामंतवादी जबकि भारत के सामाजिक ढांचे के बारे में जो कुछ भी, कम ज्यादा दस्तावेज में लिखा है उससे तो भारत पूंजीवादी कम और सामंतवादी देश अधिक दिखाई देता है. जबकि दस्तावेज में साफ़ लिखा है कि मार्क्सवाद उन दलितों की मुक्ति का दर्शन है जो सर्वहारा बन चुके हैं... मार्क्सवाद उन दलितों को अपना दुश्मन मानता है जो बुर्जुआ बन चुके हैं (पृष्ठ 17).'
यहाँ सवाल है कि दलित सर्वहारा कैसे बनेगा? क्या आदिकाल से ही जबसे दलित वर्ग का उदय हुआ है दलित सर्वहारा नहीं है? उसके पास ऐसा क्या था जिसके न होने पर ही वह सर्वहारा बन जायेगा? यदि उत्पादन के संसाधन न होने पर कोई सर्वहारा कहलाता है तो भारत के दलित यकीनी तौर पर सर्वहारा हैं और भारत के सर्वहारा दलित. क्या इस बात से कोई फर्क पड़ता है कि भारत में सर्वहारा को दलित कहा जाये? यदि दस्तावेज लिखने वालों को ऐसा कहने में संकोचहै तो इसका अर्थ यह लगाया जा सकता है कि वे भी जातिवाद के शिकार हैं. भारत में दलित ही ऐसा वर्ग है जो सर्वहारा की मार्क्सवादी परिभाषा में सही उतरता है.
दस्तावेज में आंबेडकरवादी चिंतकों पर आरोपलगाया गया है कि उन्होंने जमीन जब्त करने, उसे पुनर्वितरण करने, किसानों और मेहनतकश जनता के सभी कर्ज को रद्द करने जैसी क्रांतिकारी योजना कभी प्रस्तुत नहीं की. लेकिन क्या लिखते वक्त कभी यह गौर किया गया कि संवैधानिक दायरे में रहकर आंबेडकरवादी चिन्तक ऐसा कर सकते हैं. उनके संवैधानिक आंदोलन से इस तरह कि आशा करना क्या बचकानी बात नहीं है. पहले यह तय कर लेना जरूरी है कि किस तरह के आंदोलन से क्या अपेक्षा की जाये. कोई अपने जूते में दूसरों का पैर डालने की कोशिश करे और साथ में यह भी कहता रहे कि पैर की गलती है कि वह अंदर नहीं जा रहा तो ऐसे में उसे क्या समझा जाए. आंबेडकरवादी चिंतकों को उनकी सीमा में समझने की जगह उन्हें अपने ढांचे में ठूस देना सैधांतिक दरिद्रता है.
दस्तावेज पढ़ने पर एक बार लगता है कि इसके प्रस्तावकों को मार्क्सवाद पर कम विश्वास है और ये दलित चिन्तक से अधिक डरे हुए हैं.

Wednesday, 5 November 2014

लघुकथा लेखन के लिए अलग एप्रोच की जरूरत है: राजेन्द्र यादव


‘हंस’ में सबसे अधिक संख्या में मिलनेवाली रचनाएँ हैं- ग़जलें और लघुकथाएँ। जिन्हें न भाषा की समझ है, न मुहावरे का ज्ञान ।वे उर्दू के भयानक शब्दों को लेकर ग़जलें झाड़े चले जाते हैं। पढ़कर कोफ़्त होती है, सिर धुनने को मन करता है। हाय,ग़जल तेरी यह दुर्दशा! गुलाम अली से लेकर पंकज उदास तक लोकप्रिय गायकों ने ग़ज़लों का ही सहारा लिया है। मलिका पुखराज और बेगम अख्तर को कौन भूल सकता है? ग़ज़ल की इस झनझना देनेवाली लोकप्रियता ने हर श्रोता को ग़ज़लकार बना दिया है।
इधर लघुकथाओं की बाढ़ आई है राजनैतिक विडम्बनाओं से। हर मंचीय कवि इनका इस्तेमाल करता है। शायद यह कहना सही होगा कि लघुकथाओं के नाम पर 99 प्रतिशत ये चुटकुले ही होते हैं। नेताओं के भ्रष्टाचार, आडंबर, ढोंग, हृदयहीनता ही अनिवार्यत: इन चुटकुलों के कथ्य हैं। इससे लेखकों के सामाजिक सरोकार तो पता लगते हैं, मगर प्राय: दो विरोधी स्थितियों को रखकर ही यहाँ चमत्कार पैदा कर दिया जाता है–धार्मिक अनुष्ठानी नेता चकलाघर चलाते हैं और त्याग और अपरिग्रह की बात करनेवाले स्मगलिंग करते हैं। कभी–कभी तो फूहड़पने की यह स्थिति है कि नामों को लेकर ‘लघुकथा’ गढ़ दी जाती है, जैसे दयाराम नाम के साहब मूलत: कितने क्रूर हैं। अक्सर हृदयहीनता भी इनके विषय होते हैं–भूखे मरते आदमी के लिए खाना नहीं है, कुत्तों और गायों को भोज कराया जाता है। मैं नहीं कहता कि हमारा समाज इन भयावह स्थितियों से नहीं गुजर रहा, मगर अखबार की कतरनें लघुकथाएँ नहीं होतीं। इन लघुकथाओं का दूसरा प्रिय विषय है पशु–पक्षियों के माध्यम से राजनैतिक टिप्पणी। हालत यह है कि लघुकथाओं की दुनिया राजनैतिक भेड़ियों, सियारों, शेर–भालुओं और बंदरों और कुत्तों से भरी पड़ी है। लगता है सारी लघुकथा, मदारियों, सर्कस–मालिकों या जू–व्यवस्थापकों के हाथों में चली गई है। वस्तुत: ‘लघुकथा’ आज गिने–चुने फामू‍र्लों का विस्तार होकर रह गई है।
मुझे लगता है जैसे गीत किसी लंबी कविता या खंडकाव्य का अर्क नहीं है, वैसे ही लघुकथा न बड़ी कहानी का सार–संक्षेप है, न उसकी रूपरेखा। एक छोटा चित्र अगर बड़ा कर दिया जाए, तो भी रहेगा वह वही चित्र। लघुकथा ग़ज़ल या दोहे की तरह एक स्वतंत्र विधा है, यह दूसरी बात है कि बहुत–सी लघुकथाएँ संभावनाओं के अनुसंधान में बाकायदा कहानी का रूप ले सकती हैं। पंचतंत्र,हितोदेश और जातक कथाओं, थेरी गाथाओं, अनंत लोककथाओं से लेकर ईसप, खलील ज़िब्रान ख्वाजा नसीरुदीन, कन्फ्यूशियस और अब आचार्य रजनीश तक लघुकथाओं की दुनिया का विस्तार रहा है। आदि–स्रोत तो पुराण, हदीस और बाइबिल हैं ही। थीम उन सबकी मूलत: दो–तीन ही हैं : व्यावहारिक समझदारी, सामाजिक विवेक और धार्मिक उपदेश- कथाएँ। वे प्राय: अपने सिद्धांतों और विश्वासों के प्रतिपादन या खुलासे के लिए दृष्टांत कथाओं के रूप में कही जाती हैं। कहीं–कहीं अपने धर्म–गुरुओं के गुणगान या उनकी सिद्धियों के चमत्कार दिखानेवाली कथाएँ भी हैं। आज भी वे अपनी संक्षिप्ति और प्रतिपादित ‘सत्य’ के कारण तत्काल प्रभाव डालती हैं, सोचने–विचारने के चमत्कारी सूत्र भी हमें वहाँ मिलते हैं, मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे पढ़ने के लिए नहीं, सुनाए जाने के लिए कही जाती थीं, इसलिए मोटे–मोटे सामान्यीकरणों या काले–सफेद में बँटी थीं। द्वंद्व दुष्ट और भले के बीच ही होता था। शायद इसी कारण वे ‘लोक’ में सबसे अधिक स्वीकृत हुई या ‘स्वीकृति’ के दौरान लोक ने उन्हें अपने अनुकूल ढाल लिया।
मुद्रण–सुविधाओं और पढ़ने की परंपरा ने साहित्य की अन्य विधाओं की तरह लघुकथाओं में भी गुणात्मक परिवर्तन किए। कहानियाँ ज्यादा बारीक और अर्थगर्भी हुईं। मुझे ऐसा भी लगता है कि लघुकथाओं के इस रूप का प्रारंभ मुख्यत: गद्यगीतकारों के हाथों हुआ है ओर छायावादी युग में कवियों ने अपनी रहस्यानुभूतियों की कौंध (फ्लैश) को ही शब्दबद्ध करने की कोशिशें की हैं। शायद यह भी है कि लघुकथाओं में आज जो विषय की जटिलता और गहराई या रूप का गठन और विधा की स्वायत्तता आई है उसका श्रेय कथाकारों से अधिक कवियों, संतों और गद्यगीतकारों को अधिक जाता है। मुझे शक यह भी होता है कि क्या गद्यगीत ही लघुकथाओं की मूल भावस्थितियाँ नहीं थे? डेढ़ सौ साल पहले लिखी तुर्गनेव की ‘पोइम्स इन प्रोज़ के रूप में लिखी लघुकथाओं से ऐसी धारणा को बल मिला। अपने यहाँ भी इस दिशा में अनायास ही जो नाम उभरकर आते हैं उनमें रवींद्रनाथ ठाकुर तो हैं ही, हिंदी में महादेवी वर्मा, दिनेशनंदिनी, चौरडि़या, जैनेन्द्र कुमार, भँवरमल सिंधी, ब्रजलाल ब्रयाणी की रचनाएँ लघुकथाओं और गीतों की सरहदों में दुतरफा संक्रमण करती हैं। वैसे मैं आज भी तोल्स्तोय की कुछ लघुकथाएँ भूल नहीं पाता।
बहरहाल, इस क्षेत्र में बंगला के बनफूल और हिंदी के रावी का योगदान अनदेखा नहीं किया जा सकता। दोनों ने ही इसका गंभीर रचना के रूप में प्रारंभ किया, मगर लगता आज भी नहीं कि लघुकथा एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित हो पाई है–हालाँकि इधर बलराम द्वारा पाँच बड़ी जिल्दों में कोश बनाने की दुस्साहसी योजना मेरे सामने है (चार खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं–सं0) और छोटी पत्रिकाओं के लघुकथा अंक भी दो–चार देखे हैं। सम्मेलनों और गोष्ठियों की रिपोर्ट भी गाहे–बगाहे आ जाती हैं। शायद इसके दो कारण हैं। एक तो अभी तक इस क्षेत्र में इधर कोई ऐसी प्रथम श्रेणी की प्रतिभा नहीं आई है जिसने गहरी अंतर्दृष्टि दिखाई हो या विधा में प्रयोग किए हों, यानी जो अपनी आग से सबका ध्यान आकर्षित कर ले; दूसरे, इसके सिद्धांतपक्ष पर गंभीरता से कोई काम नहीं हुआ। अधिकतर कथाकारों ने पंद्रह–बीस लघकथाएँ जरूर लिखी हैं और निश्चय ही बहुत अच्छी हैं, मगर वह उनका मुख्य लेखन नहीं है। आज मुझे प्रथम श्रेणी का कोई लेखक,लघुकथाकार के रूप् में याद नहीं आ रहा। वे सब बाई द वे या पार्ट–टाइम प्रयासों की तरह हैं। किसी भी साहित्य में जब तक एक विधा के पाँच–सात पूर्णकालिक लेखक न हों, तब तक वह स्वतंत्र रूप में कैसे स्थापित हो सकती है? संस्कृत–पालि की बात छोड़ दें तो मुझे हिंदी में एक भी ऐसा कथाकार याद नहीं आ रहा है जो ख़लील ज़िब्रान की तरह अपने–आप में लघुकथा–लेखक के रूप में ही जाना जाता हो–यूँ रवीन्द्र वर्मा, उदय प्रकाश, रघुनंदन त्रिवेदी, प्रेमकुमार मणि, युगल, अवधेश कुमार, सुकेश साहनी या उर्दू में इंतजार हुसैन, जोगिन्दर पाल ने अद्भुत लघुकथाएँ लिखी हैं। इससे ज्यादा दयनीय स्थिति क्या होगी कि साहित्य की हर विधा को उपकृत करनेवाले ‘आचार्य’ गिरिराज किशोर तक से यह विधा अभी तक अबलात्कृत रही है।
हिंदी में आज की लघुकथाओं में सामाजिक–राजनैतिक सरोकार और बेचैनी तो बहुत है, मगर प्राय: समकालीन जीवन–स्थितियों के अनुभूति–स्पंदित क्षणों से बचने की प्रवृत्ति है। हममें से अधिकांश रूपक, प्रतीक, दृष्टांत जैसी ‘तरकीबों’ का सहारा लेना ज्यादा पसंद करते हैं।
कभी–कभी तो एक सूक्ति या वाक्य ही आधार बन जाता है। चूँकि यहाँ बहुत संक्षेप में बात का निचोड़ देना पड़ता है, इसलिए बड़ी कहानियों का सार–संक्षेप देने या शाश्वत सत्य उद्घाटित करने की मानसिकता आज की लघुकथाओं की प्रेरणा लगती है। बड़े चित्र को छोटा कर देना ही मिनियेचर–पेंटिंग नहीं होती–दोनों के लिए दो अलग एप्रोच की जरूरत है। उस अलग एप्रोच की अभी तक अलग से पड़ताल मेरे देखने में नहीं आई है। ग़ज़ल या दोहे की तरह जब तक इस विधा में बारीक–खयाली और ‘देखन में छोटे लगें’ वाली भाषा पर गंभीरता से काम नहीं होता, तब तक यह हाशियों पर बना दिए गए फूल–पत्तों की हैसियत से ऊपर नहीं उठ पाएगी।
वस्तुत: फोटोग्राफी की भाषा में लघुकथा एक ऐसा ‘स्नैपशाट’ है जिसे समय के प्रवाह में स्थिर कर दिया गया है। वह समग्र का हिस्सा भी है और स्वतंत्र भी। ‘कहानी’ उसके संदर्भों के साथ ही अर्थ संकेतित करती है।